मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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अन्वय —विषमेषु अपि पथिषु अचलता धुर्येण अस्य गुरुणा सुविश्रब्धै अङ्गै भुवं गुरु अपि या चिरम् ऊढा तामेव उच्चै धुरं नववयसि वोढुं व्यवसित मनस्वी दम्यत्वात् दु खं वहति च न स्खलति च ॥३॥
व्याख्या—विषमेषु—गहनेषु (पक्षे) नतोन्नतेषु, अपि, पथिषु—कार्यावधिषु (पक्षे) मार्गेषु, अचलता—स्थिरेण, धुर्येण—धुरन्धरेण (पक्षे) वृषभेण, अस्य—मौर्यस्य, गुरुणा पित्रा नन्देनेत्यर्थ , सुविश्रब्धै —विश्वासपात्रे (पक्षे) सुदृढे , अङ्गै —मन्त्रिप्रभृतिभि (पक्षे) स्व काद्यवयवै , भुवं —पृथिव्या , गुरु अपि—महत्यपि, या—धू , चिरम्—बहुकालपर्यन्तम्, ऊढा—धृता, तामेव—ऊढामेव, उच्चै —गुर्वी , धुर—भार, नववयसि—तारुण्ये, वोढु—धारयितुम्, व्यवसित —उद्यत , मनस्वी—महामना ( चन्द्रगुप्त ), दम्यत्वात्—असमाप्तशिक्षत्वात्, दु ख—क्लेश, वहति च—प्राप्नोति च, न स्खलति च—न भ्रश्यति च ॥३॥
हिन्दी अनुवाद—[आकाश में (स्थित पुरुष को लक्ष्य करके )] आप क्या कहते हैं कि ये हम लोग शीघ्रता कर रहे हैं। भद्र पुरुषो ! शीघ्रता करो। ये महाराज चन्द्रगुप्त आ ही गये हैं। जो ये—
कठिन कार्य-पद्धतियो (पक्षान्तर में ऊँचे-नीचे मार्गों) में विचलित न होने हुए भार वहन करने में समर्थ (पक्षान्तर मे वृषभ) इस (चन्द्रगुप्त) के पिता ने विश्वासपात्र (पक्षान्तर मे सुदृढ) मन्त्री आदि (पक्षान्तर मे अवयवो) से जो पृथ्वी का महान् भार चिरकाल तक वहन किया, उसी महान् भार को नवीन अवस्था म वहन करने के लिए उद्यत मनस्वी (चन्द्रगुप्त) भार वहन करने मे अनभ्यस्त होने के कारण क्लेश अनुभव करता है किन्तु गिरता नही है ॥३॥
टिप्पणी—विषमेषु—विभिन्ना समेभ्य इति विषमा , तेषु । अचलता—√चल् + शतृ = चलन् । न चलन् अचलन्, तेन । धुर्येण—धुरा धारण करने वाले । धुरि साधु तां वहति वा इति धुर्+यत्=धुर्य , तेन । यहाँ नन्द को शिक्षित वृषभ के समान धुरा धारण करने मे समर्थ होने के कारण धुर्य कहा गया है। गुरुणा—पिता, नन्द ने। सुविश्रब्धै —विश्वासी । वि√श्रम् वा स्रम्+क्त कर्तरि=विश्रब्धा वा विस्रब्धा । अतिशयेन विश्रब्धा इति सुविश्रब्धा , तै ।