भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः १७६

राजा—आर्य ! तो इस प्रकार नागरिकों ने मेरी आज्ञा को क्यों नहीं माना ?

कंचुकी—[कानों को बन्द करके] महाराज ! पाप शान्त हो, पाप शान्त हो। पृथिवी पर पहले (कभी) खाली न जाने वाली महाराज की आज्ञा नागरिकों में कैसे खाली जाएगी ?

राजा—आर्य वैहिनरि ! तो क्यो अभी भी कौमुदीमहोत्सव के प्रारंभ से शून्य कुसुमपुर को मै देख रहा हूँ ? देखो—

स्पष्ट एवं चातुर्यपूर्ण वार्तालाप में प्रवीण धूर्तों से अनुकरण की जाती हुई वेश्याये (अपने) विशाल नितम्बों के भार के आक्रमण के कारण धीमी चालों से राज-मार्गों को सुशोभित नही कर रही है । और राजा से निर्भय तथा घर की सम्पत्तियो के बल पर परस्पर स्पर्धा रखते हुए श्रेष्ठ नागरिक स्त्रियों के साथ शारदीय पूर्णिमा के उत्सव को नही मना रहे है ॥१०॥

टिप्पणीअप्रवृत्तकौमुदीमहोत्सवम्—कौमुदीमहोत्सव के प्रारंभ से शून्य। अप्रवृत्तः अनारब्धः कौमुदीमहोत्सवः शारदपूर्णचन्द्रपर्वोद्भवः यस्मिन् सः बहुव्रीहि स०। अस्खलितपूर्वम्—पहले (कभी) स्खलित न होने वाली ।√स्खल् + क्त कर्तरि = स्खलितम्। पूर्वं स्खलितम् सुप्सुपा स०, 'भूतपूर्वे चरट्' इति निर्देशात् पूर्वशब्दस्य परनिपातः। न स्खलितपूर्वम् अस्खलितपूर्वम् नञ्तत्०। स्फुटचतुरकथाकोविदैः—स्पष्ट तथा चतुरता भरी बाते करने मे पटु। कौति इति √कु (शब्दे) + विच् कर्तरि = कोः = वेदः। वेत्ति इति √विद् + क कर्तरि = विदः। कोः विदः षष्ठीतत्० = कोविदः = पण्डितः अतएव पटुः। धूर्तैः—विटों के द्वारा। अन्वीयमानाः—अनुसरण की जाती हुई। अनु√इ + शानच् कर्मणि = अन्वीयमानाः। वेशनार्यः—वेश्या। वेश्यालय को वेश कहते है। वेशस्य नार्यः वेशनार्यः। स्वामिनो मुक्तशङ्काः—स्वं धनमस्य अस्तीति स्व + आमिन् मत्वर्थे = स्वामी, तस्मात् 'भीत्रार्थानां भयहेतुः' इत्यनेन पञ्चमी। नन्द के राज्य में प्रजा को अर्थलोलुप नन्द से अपना धन छीने जाने का भय बना रहता था। अब चन्द्रगुप्त के शासन में प्रजा को ऐसा कोई भय नही है; फलतः वे मुक्तशंक = निर्भय हैं। पार्वणम्—अमावास्या और पूर्णिमा को पर्व तिथि कहते है। यहाँ पूर्णिमा से तात्पर्य है। पर्वणि भवः इति पार्वणः पर्वन् + अण्,