मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ | मुद्राराक्षसम्
चन्द्रः इव तस्य द्युतिभिः कान्तिभिः खचिता संश्लिष्टा शिखा केशगुच्छ यस्मिन् तथाविधे, राज्ञा—नृपाणां, मूर्ध्नि—मस्तके, विन्यस्तपाद—विन्यस्तो स्थापितो पादौ चरणौ येन तादृशः, मौर्य्य—वृषल, स्वैरेव—आत्मीयैरेव जनैरिति शेषः, उत्पाद्यमानम्—क्रियमाणम्, आज्ञाविघात—आदेशभङ्गं, किमिति—कथं, विषहते—मर्षयति ? स्वयमभिचरणज्ञातदुःख—स्वयम् आत्मना यत् अभिचरणम् अभिचार तस्मिन् ज्ञातम् अवगतम् दुःखं कष्टं येन तथाविध, दैवात्—भाग्यात्, पूर्णप्रतिज्ञ—पूर्णा सफला प्रतिज्ञा प्रतिश्रुतिः यस्य तथाविध, कौटिल्य—चाणक्य, कोपनोऽपि—क्रुद्धोऽपि, आयतिज्यानिभीत—आयतो उत्तरे काले या ज्यानि हानि निष्फलतेत्यर्थः तस्या भीत शङ्कितः (सन् ), पुनरपि—भूयोऽपि, प्रतिज्ञा—प्रतिश्रुति, न करोति—न विदधाति ॥१२॥
हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! चाणक्य के तपोवन में जाने या पुनः प्रतिज्ञा करने से इस (राक्षस) की क्या स्वार्थसिद्धि है ?
भागुरायण—कुमार ! यह तात्पर्य बहुत कठिन नहीं है। जैसे-जैसे दुष्ट चाणक्य चन्द्रगुप्त से दूर होता जाता है वैसे-वैसे इसकी स्वार्थसिद्धि होती है ।
शकटदास—अमात्य ! बहुत संदेह करना व्यर्थ है। यह ठीक ही है। क्योकि अमात्य देखें —
चन्द्रमा के समान चूडामणि की कान्तियों से खचित केशगुच्छ वाले राजाओं के मस्तकों पर चरणों को रखने वाला चन्द्रगुप्त अपने ही जनों से किये जाने वाले आज्ञा-भंग को कैसे सह सकता है ? अभिचार कर्म मे होने वाले दुःख को स्वयं समझने वाला तथा भाग्य से पूर्ण प्रतिज्ञा वाला चाणक्य क्रुद्ध होने पर भी भविष्यत्काल में होने वाली असफलता से सशंकित होने के कारण पुनः प्रतिज्ञा नहीं कर रहा है ॥१२॥
टिप्पणी—यावत् यावत्—वीप्सायां द्विरुक्तिः। विषहते—अत्र वर्तमानसामीप्ये लट् अतीते। 'परिनिविभ्यः'—इति षत्वम्। अभिचरण—अभिचार। तन्त्रोक्त मारण, मोहन, उच्चाटन आदि अनुष्ठान। 'हिंसाकर्माभिचारः स्यात्' इत्यमरः। दैवात्—अत्र हेतौ पञ्चमी। आयतिज्यानिभीत—आ + √ यम् + क्तिन् अधिकरणे = आयतिः = उत्तरकालः। √ ज्या + नि भावे औणादिकः = ज्यानिः। आयतौ ज्यानिः सुप्सुपा स०। तस्याः भीतः पञ्चमीतत्०। इस श्लोक