भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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१६२ मुद्राराक्षसम्

मन्दकुल—नन्दवंश, घातितम्—नाशितम्, इति हेतो, अपरागामर्षाम्यां—विरागक्रोधाभ्यां, विप्रकृता —विरक्तीकृता, मय, स्वाश्रयम्—स्वाधारम्, अलभमाना —अप्राप्नुवाना, चन्द्रगुप्तमेव—मौर्यमेव, अनुवर्तन्ते—अनुसरन्ति, पुन —पक्षान्तरे, प्रतिपक्षोद्धरणे—प्रतिपक्षाणा शत्रूणा उद्धरणे उन्मूलन, सम्भावितशक्तिम्—निश्चितसामर्थ्यम्, त्वादृश—भवत्सद्दश, अभियातारम्—शत्रुपराभवकारिणम्, आसाद्य—प्राप्य, क्षिप्रम्—शीघ्रम्, एनम्—चन्द्रगुप्तम्, परित्यज्य—विहाय, त्वामेव—भवन्तमेव, आश्रयिष्यन्ते—अवलम्बिष्यन्ते । अत्र—अस्मिन् विषये, कुमारस्य—भवत, वयमेव, निदर्शनम्—दृष्टान्त ।

हिन्दी अनुवादमलयकेतु—आर्य ! विशेष रूप से चन्द्रगुप्त के लिए (ही ऐसी बात है) ।

राक्षस—क्या कारण है कि इसके लिए मन्त्री का सकट सङ्कट नहीं है ।

मलयकेतु—चाणक्य के दोष ही चन्द्रगुप्त की प्रजाओ की विरक्ति के कारण हैं। उसके अलग हो जाने पर पहले भी चन्द्रगुप्त में अनुरक्त प्रजाएँ इस समय फिर सब तरह से उसमे अनुराग प्रकट करेंगी ।

राक्षस—कुमार ! यह ऐसा नहीं है । यहाँ दो प्रकार की प्रजाएँ हैं—चन्द्रगुप्त के साथ उठने-बैठने वाली और नन्दवंश में अनुरक्त । उनमें से चन्द्रगुप्त के साथ उठने-बैठने वाली प्रजाओ की ही विरक्ति के कारण चाणक्य के दोष हैं न कि नन्दवंश में अनुरक्त प्रजाओ की । वे तो इस कृतघ्न ने पितृवंश के समान सम्पूर्ण नन्दवंश को नष्ट कर दिया—इस कारण वितृष्णा तथा क्रोध से विक्षुब्ध होती हुई उपयुक्त अवलम्ब को न पाकर चन्द्रगुप्त का ही अनुसरण कर रही हैं । फिर शत्रुओं के उन्मूलन मे अनुमेय शक्ति वाले आप जैसे आक्रमणकारी को प्राप्त करके शीघ्र ही इस (चन्द्रगुप्त) को त्यागकर आपका ही आश्रय ग्रहण करेंगी । इस विषय मे कुमार के लिए हम ही उदाहरण हैं ।

टिप्पणीपितृकुलभूतम्—पितु कुलम् । तेन भूत गभम् मुप्मुपा स० । 'युक्ते क्ष्मादादृते भूत प्राण्यतीते समे त्रिपु' इत्यमर । घातितम्—√हन् + णिच् + क्त कर्मणि । अपरागामर्षाम्याम्—अप् √रञ्ज् + घञ् भावे = अपराग । √मृष् + घञ् भावे = मर्ष । न मर्ष अमर्ष । अपरागाश्च अमर्षश्च द्वन्द्व स०, ताभ्याम् । विप्रकृता = उपद्रवयुक्त । वि-प्र √कृ + क्त कर्मणि ।