मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः २७६
क्खवणओ आअच्छदि ? जाब मे असउगभूदं इमस्स दंसणं, ता आदित्तदंसणेण पडिहणामि । ( गृहीतो मयाऽऽर्यचाणक्येन प्रथमलेखितो लेखः, अमात्यराक्षसस्य मुद्रालाञ्छितः । तस्यैव मुद्रालाञ्छितेयमाभरण-पेटिका । चलितोऽस्मि किल पाटलिपुत्रं, तद्यावत् गच्छामि । कथं क्षपणक आगच्छति ? यावन्मेऽशकुनभूतंमस्य दर्शनं, तस्मादादित्यदर्शनेन प्रतिहन्मि । )
[ ततः प्रविशति क्षपणकः । ]
क्षपणकः—
अलिहन्ताणं प्पणमामो जे दे गंभीलदाए बुद्धीए ।
लोउत्तलेहिं लोए सिद्धि मग्गेहिं मग्गन्ति ॥२॥
( अर्हतां प्रणमामो ये ते गम्भीरतया बुद्धेः ।
लोकोत्तरैर्लोके सिद्धिं मार्गैर्मार्गयन्ति ॥२॥ )
अन्वयः—अर्हतां प्रणमामः, ये ते बुद्धेः गम्भीरतया लोके लोकोत्तरैः मार्गैः सिद्धिं मार्गयन्ति ॥२॥
व्याख्या—अर्हतां—बौद्धसंन्यासिनां, प्रणमामः—नमस्कुर्मः, ये ते—अर्हन्तः, बुद्धेः—मत्यादिपञ्चात्मकज्ञानस्य, गम्भीरतया—धीरतया, लोके—संसारे, लोकोत्तरैः—अलौकिकैः, मार्गैः—वर्त्मभिः, सिद्धिं—मोक्षं, मार्गयन्ति—अन्वेषयन्ति ॥२॥
हिन्दी अनुवाद—मैंने आर्य चाणक्य द्वारा पहले ही लिखवाया गया (वह कूट-) लेख ले लिया है, जिस पर अमात्य राक्षस की मुद्रा की छाप पड चुकी है। उसी की मुद्रा से चिह्नित यह आभूषणों की पेटी है। मैं झूठमूठ में पाटलिपुत्र के लिए चला हूँ। तो जाता हूँ। [ घूमकर और देखकर ] कैसे क्षपणक आ रहा है ? इसका दर्शन तो मेरे लिए असगुन हो गया। इसलिए सूर्य के दर्शन से (इस दोष का) निराकरण करता हूँ।
[ तब क्षपणक प्रवेश करता है । ]
हम बौद्ध संन्यासियों को प्रणाम करते हैं जो वे बुद्धि की गंभीरता के कारण संसार में दिव्य मार्गों से सिद्धि प्राप्त करते हैं ॥२॥
टिप्पणी—प्रथमलेखितः—प्रथम अंक में आ चुका है कि चाणक्य ने