मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
पृष्ठ 363, कुल 488 में से
संदर्भ में पढ़ें२८० मुद्राराक्षसम्
सिद्धार्थक के द्वारा शकटदास से एक लेख लिखवाया था। वही यह लेख है। तस्यैव मुद्रालान्छितेयम्—दूसरे अंक में राक्षस ने सिद्धार्थक को पारितोषिक के रूप में कुछ आभूषण दिये थे, जो मलयकेतु ने राक्षस को पहनने के लिए कञ्चुकी के हाथ भिजवाए थे। उन आभूषणों को सिद्धार्थक ने राक्षस की मुद्रा से मुद्रित करके उसी के पास रख छोड़ा था। उन्हीं आभूषणों की यह पेटी है। अर्हताम्—√अर्ह् + शतृ = अर्हन्त तेषाम्। कर्मणः शेषत्वविवक्षायां षष्ठी। लोकोत्तरैः—लोकेभ्य उत्तरा लोकोत्तरा = लोकातिगा प्रशस्ता इत्यर्थः, तैः। इस पद्य में अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार और श्लेष अलंकार का सङ्कर है। इसमें भी आर्या छन्द है ॥२॥
सिद्धार्थक—भदन्त ! प्पणमामि। ( भदन्त ! प्रणमामि। )
क्षपणक—सावका ! धम्मलाहो दे होदु। [ सिद्धार्थकं निर्वर्ण्य ] सावका ! पत्थाणसमुव्वहणे किदव्ववसाअं विअ दे हिअअं पेक्खामि। ( उपासक ! धर्मलाभस्ते भवतु। उपासक ! प्रस्थानसमुद्वहने कृतव्यवसायमिव ते हृदय पश्यामि। )
सिद्धार्थक—कहं भदन्तो जाणादि ? [ कथं भवन्तो जानाति ? ]
क्षपणक—सावका ! किं एत्थ जाणिदव्वं ? एसो दे मग्गादेसकुसलो सउणो करगदो लेहो अ सूचेदि। ( उपासक ! किमत्र ज्ञातव्यम् ? एष ते मार्गादेशकुशल शकुन करगतो लेखश्च सूचयति। )
सिद्धार्थक—जाणिदं भदन्तेण देसन्तरं चलिदोम्हि। ता कहेदु भदन्तो कीदिसो अज्ज दिअसो ? ( ज्ञातं भदन्तेन देशान्तर चलितोऽस्मि। तत् कथयतु भदन्त कीदृशोऽद्य दिवस ? )
क्षपणक—[ विहस्य ] सावका ! मुण्डिअमुण्डो तुम णक्खत्ताइ पुच्छसि ? ( उपासक ! मुण्डितमुण्डस्त्वं नक्षत्राणि पृच्छसि ? )
सिद्धार्थक—भदन्त ! सम्पदं पि किं जादं ? ता कहेहि, जइ अत्तणो अणुऊल भविस्सदि, ता गमिस्सं, अण्णधा णिवत्तिस्स ( भदन्त ! साम्प्रतमपि किं जातम् ! तत् कथय, यद्यात्मनोऽनुकूलं भवेत्, तदा गमिष्यामि, अन्यथा निर्वर्तिष्ये । )