मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः २८१
क्षपणकः—साबकाणं सम्पदं एदस्सिं मलयकेदुकडए अणण्ऊलेण बा किं ? अगहीदमुद्देण ण गच्छीअदि । ( उपासकानां साम्प्रतमेतस्मिन् मलयकेतुकटके अनुकूलेनाऽनुकूलेन वा किम् ? अगृहीतमुद्रेण न गम्यते । )
सिद्धार्थंकः—भदन्त ! कहेहि, कुदो क्खु अअं । ( भदन्त ! कथय, कुतः खल्वयम् ? )
हिन्दी अनुवाद—सिद्धार्थक—भदन्त ! प्रणाम करता हूँ ।
क्षपणक—उपासक ! तुम्हे धर्म का लाभ हो । [ सिद्धार्थक को अच्छी तरह देखकर ] उपासक ! यात्रा की तैयारी में कृतनिश्चय के समान तुम्हारे हृदय को देख रहा हूँ।
सिद्धार्थक—भदन्त कैसे जानते हैं ?
क्षपणक—उपासक ! इसमें जानना क्या है ? यह तुम्हारे मार्ग की सूचना देने में निपुण शकुन तथा हाथ में लिया लेख बता रहा है ।
सिद्धार्थक—भदन्त ने जान लिया कि मैं परदेश को जा रहा हूँ। इसलिए भदन्त बताएँ कि आज दिन कैसा है ।
क्षपणक—[ हँसकर ]—उपासक ! तुम मूंड़ मुंडाकर नक्षत्रो को पूछ रहे हो ?
सिद्धार्थक—भदन्त ! अभी भी क्या हुआ है ? इसलिए बताइये, यदि ( दिन ) अपना अनुकूल होगा तो जाऊँगा नहीं तो लौट जाऊँगा ।
क्षपणक—उपासको के लिए इस समय इस मलयकेतु के शिविर मे अनुकूल या प्रतिकूल होने से क्या ? बिना मुद्रा के नही जा सकते ।
सिद्धार्थक—भदन्त ! कहिए, यह कैसे ?
टिप्पणी—प्रस्थानसमुद्वहने—यात्रासम्पादने विषये इत्यर्थः । प्रस्थानस्य समुद्वहनम्, तस्मिन् । मागर्दिशकुशलः—अध्वसूचननिपुण । मार्गस्य आदेशः । तस्मिन् कुशलः । शकुनः—प्रस्थानसामयिकमुहूर्तविशेष इत्यर्थः । शवनोति सूचयितुम् इति √ शक्+उन कर्तरि औणादिक = शकुनः । मुण्डितमुण्डः..... सिर मुंड़ाकर पूछ रहे हो कि मुंडन का नक्षत्र कैसा है, अरे ! यात्रा करने से