भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

पञ्चमोऽङ्कः २८३

**हिन्दी अनुवाद—क्षपणक—**उपासक ! सुनो, पहले तो यहाँ मलयकेतु के शिविर में बिना रोक-टोक के लोगों का आना-जाना होता था । अब यहाँ से पाटलिपुत्र के समीप आ जाने पर किसी को भी बिना मुद्रा से चिह्नित हुए बाहर जाने या भीतर प्रविष्ट होने के लिए अनुमति नहीं दी जाती है। इसलिए यदि भागुरायण का मुद्रा-चिह्न हो तो बेखटके चले जाओ, अन्यथा लौटकर उत्सुकता से रहित होकर रहो । ताकि शिविर के अधिकारियों के द्वारा हाथ-पैर बाँधे हुए तुम राज-गृह में प्रविष्ट न करा दिये जाओ ।

**सिद्धार्थक—**क्या भदन्त नहीं जानते हैं कि मैं अमात्य राक्षस का विनोदी सेवक सिद्धार्थक हूँ । इसलिए बिना मुद्रा-चिह्न के भी बाहर जाते हुए मुझे रोकने की किसकी शक्ति है ?

**क्षपणक—**उपासक ! राक्षस या पिशाच का विनोदी रहो, किन्तु, बिना मुद्रा-चिह्न के तुम्हारे लिए यहाँ से बाहर निकलने का ( कोई ) उपाय नहीं है ।

**सिद्धार्थक—**भदन्त ! क्रोध मत कीजिए, कहिए कि मेरा कार्य सिद्ध हो जाय ।

**क्षपणक—**उपासक ! जाओ, तुम्हारा कार्य सिद्ध हो । मैं भी पाटलिपुत्र जाने के लिए भागुरायण से मुद्रा लेता हूँ ।

[ दोनों चले जाते हैं । ]

[ प्रवेशक समाप्त ]

**टिप्पणी—निशामय—**सुनो । नि √ शम् (चुरादि) + णिच् + लोट्—हि । अमुद्रालाञ्छितः—√ लाञ्छ् + क्त कर्मणि = लाञ्छितः । मुद्र्यते अनया इति √ मुद् + णिच् + अ करणे = मुद्रा । तया लाञ्छितः । न तथा इति अमुद्रा-लाञ्छितः नञ्तत्० । **निरुत्कण्ठम्—**निरुत्सुकम् यथा स्यात् तथा । **गुल्मस्थाना-धिपैः—**प्रहरिभिः । **संयमितकरचरणः—**करौ च चरणौ च इति करचरणम् प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः । संयमितं करचरणमस्य इति संयमितकरचरणः । **राजकुलम्—**नृपालयम् । **प्रवेश्यसे—**प्र √ विश् + णिच् + लट् कर्मणि । इस वाक्य में 'मा' माङ् वाला नहीं है, अपि तु निषेधार्थक शुद्ध मा है । इसीलिए 'प्रवेश्यसे' में 'माङि लुङ्' से लुङ् लकार नहीं हुआ । **केलिकरः—**हास्यकरः । **अन्तिकः—**निकटवर्ती । कुप्य—√ कुप् ( दिवादि ) + लोट्—हि । भागु-