भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पञ्चमोऽङ्कः २८५

दृष्टनष्टान्वेषणान्नश्यदुद्योगा, 'मुहुः, 'बहुप्रापितफला—निर्वहणे सर्वार्थोपसहारादुपगतसाफल्या ॥३॥

हिन्दी अनुवाद—[ तत्पश्चात् एक अनुचर के साथ भागुरायण प्रवेश करता है । ]

भागुरायण—[ मन मे ] आर्य चाणक्य की नीति की विचित्रता अद्भुत है। क्योकि—

बार-बार अनुमान करने योग्य प्राकट्य वाली, फिर भी उपलब्धि के अभाव के कारण दुर्बोध, क्षण-क्षण में परिपुष्ट अगो वाली, फिर भी कार्य के अनुरोध से अत्यन्त क्षीण, बार-बार नष्ट बीज वाली, फिर भी अत्यधिक फल प्राप्त कराने वाली नीतिज्ञ की नीति भाग्य के समान बहुरंगी होती है, यह आश्चर्य है ॥३॥

टिप्पणीसम्पूर्णाङ्गी—सम्पूर्णानि अङ्गानि अस्याः इति सम्पूर्णाङ्गी बहुव्रीहि स०, ङीप् । इस श्लोक मे सन्धियो का विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है—मुहुर्लक्ष्योद्भेदा—मुखसन्धि । मुहुर्धगमाभावगहना मुहुर्तिकृशा कार्यवशतः—प्रतिमुखसन्धि । मुहुर्नश्यद्वीजा—गर्भसन्धि । मुहुः सम्पूर्णाङ्गी—विमर्शसन्धि । मुहुपि बहुप्रापितफला—निर्वहणसन्धि । इस पद्य मे काव्यलिंग से अनुप्राणित उपमा और अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकारो की ससृष्टि है । इसमें प्रसाद गुण है, पाञ्चाली रीति है और शिखरिणी छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥३॥

[ प्रकाशम् ] भद्र भासुरक ! न मां दूरीभवन्तमिच्छति कुमारः । अतोऽस्मिन्नेवास्थानमण्डपे विन्यस्यतामासनम् ।

पुरुषः—एदं आसणं, उपविसदु अज्जो । ( एतदासनम्, उपविशत्वार्यः । )

भागुरायणः—[ उपविश्य ] भद्र भासुरक ! यः कश्चिन्मुद्रार्थी मां द्रष्टुमिच्छति, स त्वया प्रवेशयितव्यः ।

पुरुषः—जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

[ इति निष्क्रान्तः ]