मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३०६ | मुद्राराक्षसम् |
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सिद्धार्थक—णिसामेदु कुमालो, अह क्खु अमच्चरक्खसेण इम लेह देइअ, चन्दउत्तसआस प्पेसिदोम्हि । ( निशामयतु कुमार, अह खल्वमात्यराक्षसेनेम लेख दत्त्वा चन्द्रगुप्तसकाश प्रेषितोऽस्मि । )
मलयकेतु—भद्र वाचिकमिदानी श्रोतुमिच्छामि ।
हिन्दी अनुवाद—भागुरायण—[ देखकर ] कुमार ! यह भी राक्षस की मुद्रा से अंकित ही है ।
मलयकेतु—यह पत्र का रिक्ततापूरक ( उपहार ) होगा । इस मुद्रा को भी बचाते हुए खोलकर दिखाओ ।
भागुरायण—[ वैसा करके दिखाता है । ]
मलयकेतु—[ देखकर ] अरे ! यह तो वह आभूषण है, जिसे मैंने अपने शरीर से उतार कर राक्षस के लिए भेजा था । स्पष्टतः, यह चन्द्रगुप्त के लिए पत्र है ।
भागुरायण—कुमार ! अभी संदेह का निर्णय कर लिया जाता है । भद्र ! फिर पीटो ( इसे ) ।
पुरुष—आर्य की जैसी आज्ञा । [ निकलकर और पुनः प्रवेश करके ] आर्य ! पीटने पर इसने कहा—कुमार को स्वयं ही बताऊँगा ।
मलयकेतु—प्रवेश कराओ ।
पुरुष—कुमार की जैसी आज्ञा ।
[ निकलकर सिद्धार्थक के साथ पुनः प्रवेश करता है । ]
सिद्धार्थक—[ पैरों पर गिरकर ] कुमार मुझे अभयदान देने की कृपा करे ।
मलयकेतु—भद्र ! भद्र !! पराधीन मनुष्य के लिए अभय ही है, इसलिए जैसा है, वैसा बताओ ।
सिद्धार्थक—कुमार सुने, अमात्य राक्षस ने मुझे यह लेख देकर चन्द्रगुप्त के पास भेजा है ।
मलयकेतु—भद्र ! अब मौखिक संदेश सुनना चाहता हूँ !