मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३१६
मलयकेतु—भागुरायण ! स्वामी के आगे डरा हुआ तथा लज्जित यह नहीं कहेगा । इसलिए स्वयम् आर्य को बता दो ।
भागुरायण—कुमार की जो आज्ञा । अमात्य ! यह कह रहा है कि मुझे अमात्य राक्षस ने पत्र देकर और मौखिक संदेश कहकर चन्द्रगुप्त के पास भेजा है ।
राक्षस—भद्र सिद्धार्थक ! क्या ( यह ) सत्य है ?
सिद्धार्थक—[ लज्जा का अभिनय करते हुए ] $\cdots\cdots\cdots$ बहुत पीटे जाते हुए मैंने ऐसा निवेदन किया ।
राक्षस—कुमार ! यह असत्य है । पीटा जाता हुआ ( व्यक्ति ) क्या नहीं कह सकता है ?
मलयकेतु—भागुरायण ! पत्र दिखाओ, मौखिक संदेश तो यह इनको अपना भृत्य कहेगा ।
टिप्पणी—प्रसीदतु प्रसीदतु—शीघ्रता सूचित करने के लिए दो वार उच्चारण किया गया है । न पारितं रहस्यं धारयितुम्—इससे सत्यता को स्वीकार किया है ।
भागुरायणः—[ लेखमवलोकयन् ] 'स्वस्ति यथास्थाने कुतोऽपि पुरुष-विशेषमवगमयति' इति वाचयति ।
राक्षसः—कुमार ! शत्रोः प्रयोग एषः ।
मलयकेतुः—लेखस्याशून्यार्थमार्येणेदमाभरणमनुप्रेषितमिति तत् कथ शत्रोः प्रयोग एष स्यात् ? [ इत्याभरणं दर्शयति । ]
राक्षसः—[ आभरणं निर्वर्ण्य ] कुमार ! नैतन्मयाऽनुप्रेषितम्, एतद्धि कुमारेण मह्यं दत्तं; मया च परितोषस्थाने सिद्धार्थकाय दत्तम् ।
भागुरायणः—भो अमात्य ! ईदृशस्याभरणविशेषस्य, विशेषतः कुमारेण स्वगात्रादवतार्य दत्तस्येयं परित्यागभूमिः ?
मलयकेतुः—वाचिकमप्याप्ततमात्सिद्धार्थकाच्छ्रोतव्यमिति लिखित-मार्येण ।