मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० मुद्राराक्षसम्
राक्षस — कुतो वाचिकम् ? कस्य वा लेख ? अयमेवास्मदीयो न भवति ।
मलयकेतु — इयं तर्हि कस्य मुद्रा ?
राक्षस — कुमार ! कपटमुद्रामप्युत्पादयितुं शक्नुवन्ति धूर्ताः ।
भागुरायण — कुमार ! सम्यगमात्यो विज्ञापयति । सिद्धार्थक ! केनायं लिखितो लेख ?
सिद्धार्थकः — [ राक्षसमुखमवलोक्य तूष्णीमधोमुखस्तिष्ठति । ]
हिन्दी अनुवाद — भागुरायण — [पत्र को देखता हुआ] 'स्वस्ति यथास्थाने' इत्यादि वाच देता है ।
राक्षस — कुमार ! यह शत्रु की चाल है ।
मलयकेतु — पत्र की रिक्तता को पूरण करने के लिए आर्य ने यह आभूषण भेजा है । तब यह शत्रु की चाल कैसे है ? [ आभूषण दिखाता है । ]
राक्षस — [ आभूषण को ध्यान से देखकर ] कुमार ! मैंने यह नहीं भेजा है । यह तो कुमार ने मुझे दिया था, और मैंने पारितोषिक के रूप में सिद्धार्थक को दे दिया ।
भागुरायण — अमात्य महोदय ! ऐसे विशिष्ट आभूषण का, विशेष करके कुमार के द्वारा शरीर से उतारकर दिये हुए का यह देने का स्थान है ?
मलयकेतु — अत्यन्त विश्वासपात्र सिद्धार्थक से मौखिक सन्देश भी सुनना चाहिए — यह आर्य ने लिखा है ।
राक्षस — कहाँ से मौखिक संदेश ? या किसका पत्र ? यह ( पत्र ) ही मेरा नहीं है ।
मलयकेतु — तब यह मुद्रा किसकी है ?
राक्षस — कुमार ! धूर्त लोग कृत्रिम मुद्रा भी बना सकते हैं ।
भागुरायण — कुमार ! अमात्य ठीक कह रहे हैं । सिद्धार्थक ! यह पत्र किसने लिखा है ?
सिद्धार्थक — [राक्षस का मुंह देखकर चुपचाप मुंह लटकाये खड़ा रहता है।]