मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० | मुद्राराक्षसम्
जो मैं पहले सहस्रो राजाओ से घिरा हुआ तथा राजा के समान नागरिकों के द्वारा अँगलियो से नवोदित चन्द्रमा की तरह दिखाया जाता हुआ धीरे-धीरे नगर से निकलता था, वही निष्फल प्रयास वाला मैं इस समय फिर उसी नगर मे चोर की भांति भय मे शीघ्रता के साथ जीर्ण-उपवन मे यह प्रवेश कर रहा हूँ ॥ १० ॥
टिप्पणी—अलक्षितोपनिपाता —बिना दिखे अर्थात् अप्रत्याशित रूप से छा जाने वाले । न लक्षितः अलक्षितः । उप-नि√पद्+घञ् भावे = उपनिपाता । अलक्षिता उपनिपाता अलक्षितोपनिपाता = अतर्कितागमा । समविषमदशाविभागपरिणतय —समाश्च विषमाश्च समविषमा तादृश्य दशाः तासा विभागा तेषा परिणतय = तुल्यातुुल्यावस्थाव्यापार्यवयपरिणामाः । पौरै — प्राचीन समय मे जब राजा बाहर निकलता था तब नागरिक अपने-अपन घरो की छत पर, सडको पर खडे होकर उसे देखने थे और एक दूसरे को दिखात हुए कहने थे कि वह राजा जा रहा है, बात कर रहा है इत्यादि । उसी तरह राक्षस को भी देखकर लोग अगुल्या निर्देश करते थे । यहाँ उसी अवस्था का स्मरण राक्षस को हो रहा है । शनै —कहा भी है कि राजा, ज्ञानी, यौवनभाराक्रान्त युवती तथा गजराज धीरे-धीरे चलते हैं । निरगमम्—निर्√गम्+लुङ्—मिप् । तस्कर —'तत्—कर' इत्यवस्थायाम् 'तद्वृहतोः करपत्योश्चोरदेवतयोः' इत्यनेन सुट् तलोपश्चेति निपातनात् तस्करपदसिद्धि । जीर्णोद्यानकम्—कुत्सितम् उद्यानम् उद्यानक्म् उद्यान्+कन् । जीर्णञ्च तद् उद्यानकम् जीर्णोद्यानकम् । इस श्लोक में राक्षस ने अपनी पहली अवस्था और वर्तमान दोनो का चित्र खींचा है । जैसे—पहले 'राजा इव' और अब 'तस्कर इव' । पहले 'पश्यन्तु लोका इति शनै' और अब 'लोकाः मा द्राक्षुः' इति द्रुतम् । पहले 'पुरात्' और अब 'जीर्णोद्यानकम्' । पहले 'निरगमम्' और अब 'विशामि' इत्यादि । इस पद्य मे तीन उपमा अलकार और द्वितीय पर्याय अलकार है । इसमे शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥१०॥
अथवा, येषा प्रसादादिदमासीत् ते एव न सन्ति । [ नाट्येन प्रविश्य विलोक्य च ] अहो ! जीर्णोद्यानस्य नाभिरमणीयता । अत्र हि—