मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३७६
मे—मम, निस्त्रिंशः—खङ्गः, मित्रस्नेहात्—सुहृदनुरागात्, विवशं—व्यग्रं, माम्—राक्षसम्, अधुना—सम्प्रति, साहसे—पौरुषे युद्धव्यापार इत्यर्थः, नियुङ्क्ते—प्रेरयति ।।१६।।
हिन्दी अनुवाद—[ प्रकट ] भद्र ! भद्र !! शीघ्र जाओ, इस समय जिष्णुदास को अग्नि में प्रवेश करने से रोको। मैं भी चन्दनदास को मृत्यु से छुड़ाता हूँ।
पुरुष—अब फिर किस उपाय से आर्य चन्दनदास को मृत्यु से छुड़ायेंगे ?
राक्षस—[ तलवार खींचकर ] इस पुरुषार्थ रूप महामित्र वाले तलवार से ही। देखो—
मेघनिर्मुक्त आकाश के समान रूप वाली, संग्राम रूपी कसौटी पर शत्रुओं के द्वारा देखी गई शक्ति वाली और बल के आधिक्य के कारण युद्ध विषयक आदर से मानो रोमांचित हाथ के साथ प्राप्त मित्रता वाली यह मेरी तलवार मित्र-प्रेम के कारण विवश मुझको इस समय साहसिक कर्म में नियुक्त कर रही है ।।१६।।
टिप्पणी—ज्वलनप्रवेशात्—अत्र 'वारणार्थानामीप्सितः' इति अपादानत्वात् पञ्चमी। मरणात्—अत्र 'भीत्रार्थानां भयहेतुः' इति अपादानत्वात् पञ्चमी। व्यवसायमहासुहृदा—व्यवसायः पौरुषं महासुहृत् प्रियसखं यस्य स व्यवसायमहासुहृत्, तेन अथवा व्यवसाये पौरुषे महासुहृत् तेन = पौरुषैकसहायेन। यह 'निस्त्रिंशेन' का विशेषण है। वि-अव√सो + घञ् भावे = व्यवसायः। 'निस्त्रिंशेन—असिना। निर्गतः त्रिंशतोऽङ्गुलिभ्यः इति निस्त्रिंशः बहुव्रीहि स०, निर्-त्रिंशत् + डच् समासान्तः 'संख्यायास्तत्पुरुषस्य वाच्यः' इति वार्त्तिकेन। विगतजलद०—अर्थात् निर्मल आकाश की भाँति चमकने वाली। कहीं 'सजलजलद०' पाठ है। इस पाठ में सजल मेघ के समान तलवार की कृष्णता तथा आकाश के समान धार की शुभ्रता विवक्षित है। पुलकित—पुलकः सञ्जातः अस्य इति पुलक + इतच्। विवशम्—वशम् = आयत्तता। विगतं वशम् अस्य इति विवशः, तम् तथाविधम्। साहसे—सहसा कृतं साहसम्, तस्मिन्। 'हिताहितानपेक्षं यत्कर्म तत्साहसं विदुः'। नियुङ्क्ते—नि√युज् + लट् = ते कर्तरि। इस श्लोक में उपमा, उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकारों की संसृष्टि है।