भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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३८२ | मुद्राराक्षसम्

व्याख्यापादयोः—चरणयोः, निपत्य—पतित्वा पादौ प्रणम्येत्यर्थः । प्रथमम्—पूर्वम्, चन्द्रगुप्तहतकेन—कुत्सितेन मौर्य्येण, आर्यशकटदासस्य, वधः—हत्या, आज्ञप्त—आदिष्टः । स च—शकटदासः, केनापि—अज्ञातेन पुरुषेण, वध्यस्थानात्—प्राणनिपातस्थानात्, अपहृत्य—आदाय, देशान्तरम्—अन्यदेशम्, अपवाहितः—प्रापितः । ततः—तदनन्तरम्, चन्द्रगुप्तहतकेन, ‘कस्मात्—कुतः कारणात्, प्रमादः अनवधानता, कृत—विहितः ?’ इति—एतदुक्त्वा, आर्यशकटदासवधवञ्चनया—पूज्यशकटदासमारणप्रतारणया, समुज्ज्वलितः—प्रदीप्तः, रोषाग्निः—क्रोधवह्निः, घातकजनवधजलेन—मारकजनहत्यावारिणा, निर्वापित—शमितः । ततः प्रभृति—तत आरभ्य, घातकाः—मारकाः, यं कमपि, गृहीतशस्त्रम्—आयुधधारिणम्, अपूर्वम्—अदृष्टपूर्वम्, पुरुष—जनं, प्रेक्षन्ते—पश्यन्ति, तदा, अर्धपथे एव—वधमार्गे एव, आत्मानम्—स्वस्य, जीवित—जीवनं, परिरक्षन्तः—परित्रायमाणाः, अप्रमत्ताः—सावधाना (सन्तः), एते—घातकाः, अप्राप्तवधस्थानम्—अनवाप्तमारणप्रदेशं, वध्य—वधाहं पुरुषमिति शेषः, व्यापादयन्ति—मारयन्ति । तस्मात्—ततः, एवम्—इत्थं, गृहीतशस्त्रैः—आयुधविशिष्टैः, अमात्यपादैः—मन्त्रिचरणैः, तत्र—वध्यस्थाने, गच्छद्भिः—प्राप्नुवद्भिः, श्रेष्ठिचन्दनदासस्य, वध—हत्या, त्वरायितः—शीघ्र येण कृतं, भवति—स्यात् ।

हिन्दी अनुवादपुरुष—[पैरों पर गिरकर] पूज्यचरण अमात्य राक्षस प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। इस नगर में पहले दुष्ट चन्द्रगुप्त ने आर्य शकटदास के वध की आज्ञा दी थी। किन्तु उसको किसी ने वध्य-स्थान से अपहृत करके दूसरे देश में पहुँचा दिया। तदनन्तर दुष्ट चन्द्रगुप्त ने ‘किस कारण ऐसी असावधानी हुई?’ यह कहकर पूज्य शकटदास के वध में हुई वञ्चना से धधकती हुई क्रोधाग्नि को वधिकों की (ही) हत्या रूपी जल से बुझा डाला। तब से लेकर वधिक लोग शस्त्र धारण किए हुए जिस किसी अजनबी व्यक्ति को आगे या पीछे देख लेते हैं, उस समय अपने जीवन की रक्षा करते हुए सावधान ये (वधिक) वध्यस्थान में बिना पहुँचे मारने योग्य व्यक्ति को आधे रास्ते में ही मार डालते हैं। इसलिए इस प्रकार शस्त्र धारण करके वहाँ जाते हुए अमात्यचरण के द्वारा सेठ चन्दनदास का वध शीघ्रतायुक्त हो जाएगा।