भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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३६६ मुद्राराक्षसम्

[ दोनों चाण्डाल चन्दनदास को सूली पर चढाने के लिए पकड लेते हैं। ]

कुटुम्बिनी—[ छाती पीटती हुई ] आर्यो ! बचाओ बचाओ।

[ पर्दा हटाते हुए राक्षस का प्रवेश ] आयुष्मति ! डरना नहीं चाहिये, डरना नहीं चाहिए। ओ सूली देने वालो ! चन्दनदास मारने योग्य नही है। क्योंकि—

जिसने पहले शत्रु के वंश के समान स्वामी के वंश को नष्ट होने हुए देखा, जो मित्रो की विपत्ति मे महान् उत्सव के समान स्वस्थता के साथ रहा और जिसका शरीर पराभव का क्षेत्र बना दिया जाने पर भी वध करने के लिए तुम लोगो को प्रिय है, उस मुझको यह यमपुरी की मार्गरेखा ( के समान ) वध्य-माला पहना दो ॥४॥

**टिप्पणी—अवश्यम्भवितव्ये—**अवश्य होने योग्य, अर्थात् मृत्यु सब की निश्चित है। फिर जो दूसरे के लिए मरता है, उसकी मृत्यु प्रशंसनीय होती है। मैं अपने मित्र के लिए प्राण त्याग कर रहा हूँ। इसलिए, तुम्हें शोक नही करना चाहिये। यहाँ पूर्वोक्त शोकदीनवदनादि विभावो और अनुभावों से पुष्ट करुण रस स्थायी है। **सोरस्ताडम्—**ताडन ताड, उरस्ताडः उरस्ताडः, तेन सहित यथा स्यात् तथा सोरस्ताडमिति क्रियाविशेषणम् । **पटाक्षेपेण—**आ सम्यक् क्षेपः अपसारणम् = आक्षेपः । पटस्य आक्षेपः। असूचितस्य पात्रस्य सहसा प्रवेशः पटाक्षेपः तेन । **शूलायतना —**शूलम् आयतन जीवन येषा ते शूलायतनाः शूलजीविन इत्यर्थ , तत्सम्बुद्धौ । **परिभवक्षेत्रीकृत —**परिभवस्य क्षेत्रम्, अपरिभवक्षेत्रम्, अपरिभवक्षेत्रम् परिभवक्षेत्र सम्पद्यमानः परिभवक्षेत्रीकृतः परिभवक्षेत्र + च्वि, ईत्व √कृ + क्त । **आत्मा—**शरीर । ‘आत्मा यत्नो धृति-बुद्धिः शरीरं ब्रह्म एव च’ इत्यमरः। **वधाय—**हन्तुमित्यर्थे । ‘तुमर्थाच्च भाववचनात्’ इति सूत्रेणात्र चतुर्थी । इस श्लोक में श्रौती पूर्णोपमा अलङ्कार, विरोधाभास और रूपक अलङ्कार की संसृष्टि है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १,१२ में देखिये ॥४॥

चन्दनदास —[ विलोक्य सबाष्पम् ] अमच्च ! किं एद दे व्ववसिद ? (अमात्य ! किमिद ते व्यवसितम् ?)