मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 488 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ | मुद्राराक्षसम्
राक्षस—आपके महनीय चरित्र के एक अंश का अनुकरण है।
चन्दनदास—अमात्य मेरे इस सम्पूर्ण प्रयास को निष्फल करते हुए आपने मेरा प्रिय (कार्य) नही किया।
राक्षस—मित्र चन्दनदास ! उलाहना मत दीजिए, ससार में स्वार्थ की प्रधानता है (अर्थात् सभी अपना ही स्वार्थ देखा करते हैं)। भद्रमुख ! यह बात दुष्ट चाणक्य से निवेदन कर दो।
दोनों चाण्डाल—क्या ?
राक्षस—असत् जन-रुचि वाले पापी कलियुग में भी (अपने) प्राणों से दूसरे की रक्षा करते हुए यशस्वी जिस (चन्दनदास) ने शिवि के (भी) यश को नीचा दिखा दिया और निर्मल अन्त करण वाले (जिस चन्दनदास) ने पवित्र चरित्रों से बुद्धो के चरित्र को भी तिरस्कृत कर दिया, वह पूजा के योग्य होने पर भी जिसके लिए तुम्हारा वध्य बन गया है, वह (मैं) यह हूँ ॥५॥
टिप्पणी—ते—त्वयेत्यर्थः। सम्बन्धसामान्ये षष्ठी। व्यवसितम्—अनुष्ठितम्। त्वदीयसुचरितैकदेशस्य—साधु (सुष्ठु) चरितं सुचरितम्। एको देशः एकदेशः। त्वदीयं सुचरितम्। तस्य एकदेशः, तस्य = भवत्साधुचरितैकभागस्य। स्वार्थप्रधान—स्वस्य अर्थः स्वार्थः, स प्रधानः मुख्यः यस्मिन् स स्वार्थप्रधानः = आत्मप्रयोजनसम्पादनप्रवण इत्यर्थः। जीवलोक—संसारः। औशीनरीयम्—उशीनर एक पुरुवंशी राजा थे। उनकी स्त्री दृषद्वती से राजा शिवि का जन्म हुआ था। उशीनरस्य अपत्यं पुमान् इति उशीनर + अण् 'उत्सादिभ्योऽञ्' इत्यनेन = औशीनर = शिविः। तस्येदम् इति औशीनर + छ—ईय = औशीनरीयम्। सुचरितै—अत्र करणे तृतीया। बुद्धानाम्—यहाँ बुद्ध के अनुयायियो से तात्पर्य है। अथवा बादरसूचनार्थं बहुवचन का प्रयोग किया गया है। एषोऽस्मि स—यहाँ 'अस्मि' एक अव्यय है। इस श्लोक मे दीपक अलङ्कार, व्यतिरेक अलङ्कार और परिवृत्ति अलङ्कार मे सांकर्य है। इसमे भी शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥५॥
प्रथम—अले वेणुवेत्तआ। तुम दाव सेट्ठिचन्दणदास गेण्हिअ, इमस्स मसाणपादवस्स छाआए मुहुत्तअं चिट्ठ, जाव अह अज्जचाणक्कस्स