मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३६६
णिबेदेमि, जधा गहीदो अमच्चलक्खसो त्ति । (अरे वेणुवेत्रक ! त्वं तावच्छ्रेष्ठिचन्दनदासं गृहीत्वाऽस्य श्मशानपादपस्यच्छायायां मुहूर्तं तिष्ठ, यावदार्यचाणक्यस्य निवेदयामि, यथा गृहीतोऽमात्यराक्षस इति ।)
द्वितीयः—अले बज्जलोमआ ! एब्ब होदु । (अरे वज्रलोमक ! एवं भवतु ।)
[ इति सपुत्रदारेण चन्दनदासेन सह निष्क्रान्तः । ]
प्रथमः—[ राक्षसेन सह परिक्रम्य ] के के एत्थ दुआलिआण ? णिबेदेध दाब, णन्दकुलसेण्णसञ्चअचुण्णणकुलिसस्स भौलिअकुलपइट्ठामिदधम्मसञ्चअस्स अज्जचाणक्कस्स । (कः कोऽत्र दौवारिकाणाम् ? निवेदयत तावत्, नन्दकुलसैन्यसञ्चयचूर्णनकुलिशस्य मौर्यकुलप्रतिष्ठापितधर्मसञ्चयस्यार्यचाणक्यस्य ।)
राक्षसः—[ स्वगतम् ] एतदपि नाम राक्षसेन श्रोतव्यम् ।
चण्डालः—एसो क्खु अज्जणीदिसंजमिदबुद्धिपलिसले गहीदे अमच्चलक्खसे त्ति । ( एष खल्वार्यनीतिसंयमितबुद्धिपरिसरो गृहीतोऽमात्यराक्षस इति ।)
हिन्दी अनुवाद—पहला—अरे वेणुवेत्रक ! तुम तबतक सेठ चन्दनदास को लेकर इस श्मशान-वृक्ष की छाया में क्षण भर ठहरो, जबतक मैं आर्य चाणक्य से निवेदन कर देता हूँ कि अमात्य राक्षस पकड़ लिये गये ।
दूसरा—अरे वज्रलोमक ! ऐसा (ही) हो ।
[ स्त्री-पुत्र समेत चन्दनदास के साथ बाहर चला जाता है । ]
पहला—[ राक्षस के साथ घूमकर ] यहाँ द्वारपालो मे से कौन है ? नन्दकुल के सैन्य-समूह के विध्वंस करने में वज्र (रूप) तथा मौर्य-कुल मे धर्म-राशि की प्रतिष्ठा करने वाले पूज्य चाणक्य से निवेदन करो ।
राक्षस—[ मन में ] राक्षस को यह भी सुनना है ?
चाण्डाल—ये आर्य की नीति से कुंठित बुद्धि के प्रसार वाले अमात्य राक्षस पकड़ लिये गये हैं ।