मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम अङ्क । १४३
२ चांडाल ।—अच्छा रे वज्रलोमक ! ( चन्दनदास, स्त्री, बालक और सूली को लेकर जाना है) ।
१ चांडाल ।—( राक्षस को लेकर घूम कर ) अरे ! यहा पर कौन है ? नन्दकुल सैनासच्चय के चूर्ण करनेवाले वज्र से, वैसे ही मौर्य्यकुल मे लक्ष्मी और धर्म्म स्थापना करने ५ वाले, आर्य्य चाणक्य से कहो ।
राक्षस ।—( आप ही आप ) हाय ! यह भी राक्षस को सुनना लिखा था !
१ चांडाल ।—कि आप की नीति ने जिस की बुद्धि को घेर लिया है, वह अमात्य राक्षस पकड़ा गया । १०
( परदे मे सब शरीर छिपाए केवल मुह खोले चाणक्य आता है )
चाणक्य ।—अरे कहो, कहो ।
किन निज बसन हि मैं धरी, कठिन अगिनि की ज्वाल ? रोकी किन गति वायु की, डोरिन ही के जाल ? १५ किन गजपति मर्द्दन प्रबल, सिंह पींजरा दीन ? किन केवल निज बाहु बल, पार समुद्रहि कीन ?
१ चांडाल —परमनीतिनिपुण आप ही ने तो।
चाणक्य ।—अजी ! ऐसा मत कहो, वरन “नन्दकुलद्वेषी दैव ने ” यह कहो । २०
राक्षस ।—( देख कर आप ही आप ) अरे ! क्या यही दुरात्मा वा महात्मा कौटिल्य है ?
सागर जिमि बहु रत्नमय, तिमि सब गुण की खानि । तोष होत नहि देखि गुण, बैरी रूप निज जानि ॥
चाणक्य ।—( देख कर ) अरे ! यही अमात्य राक्षस है ? २५ जिस महात्मा ने—