मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १४४ | मुद्राराक्षस |
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बहु दुख सों सोचत सदा, जागत रैन बिहाय।
मेरी मति अरु चन्द्र की, सैनहि दई थकाय ॥
(परदे से बाहर निकल कर) अजी अजी अमात्य राक्षस ! मै विष्णुगुप्त आप को दण्डवत् करता हूं। (पैर छूता है)
५ राक्षस।—(आप ही आप) अब मुझे अमात्य कहना तो केवल मुंह चिढ़ाना है (प्रगट) अजी विष्णुगुप्त ! मैं चाडालों से छू गया हू इस से मुझे मत छूओ।
चाणक्य।—अमात्य राक्षस ! वह श्वपाक नही है, वह आप का जाना सुना सिद्धार्थक नामा राजपुरुष है और दूसरा
१० भी समिद्धार्थक नामा राजपुरुष ही है, और इन्ही दोनों द्वारा विश्वास उत्पन्न कर के उस दिन शकटदास को धोखा दे कर मै ने वह पत्र लिखवाया था।
राक्षस।—(आप ही आप) अहा ! बहुत अच्छा हुआ कि मेरा शकटदास पर से संदेह दूर हो गया।
१५ चाणक्य।—बहुत कहा तक कह—
वे सब भद्रभटादि वह, सिद्धार्थक वह लेख।
वह भदन्त वह भूषणहु, वह नट-कपट भेख ॥
वह दुख चन्दनदास को, जो कछु दियो दिखाय।
सो सब मम (लज्जा से कुछ सकुच कर)
२० सो सब राजा चन्द्र को, तुम सो मिलन उपाय ॥
देखिए, यह राजा भी आप से मिलने आप ही आते हैं।
राक्षस।—(आप ही आप) अब क्या करें ? (प्रगट) हा ! मै देख रहा हू।
(सेवको के सग राजा आता है)
२५ राजा।—(आप ही आप) गुरु जी ने बिना युद्ध ही दुर्जय शत्रु का कुल जीत लिया इस में कोई संदेह नही, मैं तो बड़ा लज्जित हो रहा हूं, क्योंकि—