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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ
१४४मुद्राराक्षस

बहु दुख सों सोचत सदा, जागत रैन बिहाय।
मेरी मति अरु चन्द्र की, सैनहि दई थकाय ॥
(परदे से बाहर निकल कर) अजी अजी अमात्य राक्षस ! मै विष्णुगुप्त आप को दण्डवत् करता हूं। (पैर छूता है)
५ राक्षस।—(आप ही आप) अब मुझे अमात्य कहना तो केवल मुंह चिढ़ाना है (प्रगट) अजी विष्णुगुप्त ! मैं चाडालों से छू गया हू इस से मुझे मत छूओ।
चाणक्य।—अमात्य राक्षस ! वह श्वपाक नही है, वह आप का जाना सुना सिद्धार्थक नामा राजपुरुष है और दूसरा
१० भी समिद्धार्थक नामा राजपुरुष ही है, और इन्ही दोनों द्वारा विश्वास उत्पन्न कर के उस दिन शकटदास को धोखा दे कर मै ने वह पत्र लिखवाया था।
राक्षस।—(आप ही आप) अहा ! बहुत अच्छा हुआ कि मेरा शकटदास पर से संदेह दूर हो गया।
१५ चाणक्य।—बहुत कहा तक कह—
वे सब भद्रभटादि वह, सिद्धार्थक वह लेख।
वह भदन्त वह भूषणहु, वह नट-कपट भेख ॥
वह दुख चन्दनदास को, जो कछु दियो दिखाय।
सो सब मम (लज्जा से कुछ सकुच कर)
२० सो सब राजा चन्द्र को, तुम सो मिलन उपाय ॥
देखिए, यह राजा भी आप से मिलने आप ही आते हैं।
राक्षस।—(आप ही आप) अब क्या करें ? (प्रगट) हा ! मै देख रहा हू।
(सेवको के सग राजा आता है)
२५ राजा।—(आप ही आप) गुरु जी ने बिना युद्ध ही दुर्जय शत्रु का कुल जीत लिया इस में कोई संदेह नही, मैं तो बड़ा लज्जित हो रहा हूं, क्योंकि—

सप्तम अङ्क । १४

सप्तम अङ्क । १४

ह्वै बिनु काम लजाय करि, नीचो मुख भरि सोक ।
सोवत सदा निषङ्ग में, मम बानन के थोक ॥
सोवहि धनुष उतारि हम, जदपि सकहि जग जीति ।
जा गुरु के जागत सदा, नीति निपुण गत भीति ॥
( चाणक्य के पास जाकर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त प्रणाम ५
करता है ।
चाणक्य ।—वृषल ! अब सब असीस सच्ची हुई, इस से
इन पूज्य अमात्य राक्षस को नमस्कार करो, यह
तुम्हारे पिता के सब मन्त्रियों में मुख्य है ।
राक्षस ।—( आप ही आप ) लगाया न इस ने सम्बन्ध १०
राजा ।— ( राक्षस के पास जा कर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त
प्रणाम करता है ।
राक्षस ।—( देख कर आप ही आप) अहा ! यही चन्द्रगुप्त
है !
होनहार जाको उदय, बालपने ही जोइ । १५
राज लह्यो जिन बाल गज, जूथाधिप सम होइ ॥
( प्रगट ) महाराज ! जय हो ।
राजा ।—आर्य्य !
तुमरे आछत बहुरि गुरु, जागत नीति प्रबीन ।
कहहु कहा या जगत में, जाहि न जय हम कीन ॥ २०
राक्षस ।—( आप ही आप ) देखो, यह चाणक्य का सिखाया
पढ़ाया मुझ से कैसी सेवको की सी बात करता है !
नहीं २, यह आप ही विनीत है । अहा ! देखो, चन्द्रगुप्त
पर डाह के बदले उलटा अनुराग होता है । चाणक्य
सब स्थान पर यशस्वी है, क्योंकि— २५
पाइ स्वामि सतपात्र जौ, मन्त्री मूरख होइ ।
तौह पावै लाभ जस, इत तौ पण्डित दोइ ॥

१८६ मुद्राराक्षस-

मूरख स्वामी लहि गिरै, चतुर सचिव हू हारि ।
नदी तीर तरु जिमि नसै, तीरन ह्वै लहि बारि ॥

चाणक्य।—क्यों अमात्य राक्षस ! आप क्या चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हैं ?
५ राक्षस ।—इस मे क्या सन्देह है ?
चाणक्य ।—पर अमात्य ! आप शस्त्र ग्रहण नही करते, उस से सन्देह होता है कि आप ने अभी राजा पर अनुग्रह नही किया, इस से जो सच ही चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हों तो यह शस्त्र लीजिये ।
१० राक्षस ।—सुनो विष्णुगुप्त ! ऐसा कभी नही हो सकता, क्योंकि हम लोग उस योग्य नही, विशेष कर के जब तक तुम शस्त्र ग्रहण किए हो तब तक हमारे शस्त्र ग्रहण करने का क्या काम है ?
चाणक्य । - भला अमात्य ! आपने यह कहा से निकाला,
१५ कि हम योग्य हैं और आप अयोग्य हैं ? क्योंकि देखिये—
रहत लगामहि कसे अश्व की पीठ न छोडत ।
खान पान असनान भोग तजि सुख नहि मोडत ॥
छूटे सब सुख साज नीद नहि आवत नयनन ।
निसि दिन चौंकत रहन बीर सब भय धरि तिन मन ॥
२० वह हौदन सों सब छन कस्यौ नृप गजगन अवरोखिए ।
रिपुदर्प्प दूर कर अति प्रबल निज महात्मबल देखिए ॥

वा इन बातों से क्या ! आप के शस्त्र ग्रहण किये बिना तो चन्दनदास बचता भी नही ।
राक्षस । ( आप ही आप )
२५ नन्द नेह छूट्यौ नही, दास भए अरि साथ ।
ते तरु कैसे काटि ह, जे पाले निज हाथ ॥

सप्तम अंक । १४७

सप्तम अंक । १४७

कैसे करिहैं मित्र पै, हम निज कर सों घात ।
अहो भाग्य गति अति प्रबल, मोहि कछु जानि न जात ॥
( प्रकाश अच्छा विष्णुगुप्त ! मगाओ खड्ग “नमस्सर्व्वकार्य्यप्रतिपत्तिहेतवे सुहृत्स्नेहाय ” देखो, मै उपस्थित हूं ।
चाणक्य ।—( राक्षस को खड्ग दे कर हर्ष से ) राजन वृषल ! ५
बधाई है बधाई है । अब अमात्य राक्षस ने तुम पर अनुग्रह किया । अब तुम्हारी दिन दिन बढ़ती ही है ।
राजा ।—यह सब आप की कृपा का फल है ।
( पुरुष आता है । )
पुरुष ।—जय हो महाराज की, जय हो । महाराज ! भद्रभट १०
भागुरायणादिक मलयकेतु को हाथ पैर बाध कर लाए है और द्वार पर खड़े हैं, इस मे महाराज का क्या आज्ञा होती है ?
चाणक्य ।—हा, सुना । अजी ! अमात्य राक्षस से निवेदन करो, अब सब काम वही करेंगे । १५
राक्षस ।—(आप ही आप) कैसे अपने वश मे कर के मुझी से कहलाता है । क्या करै ? ( प्रकाश ) महाराज, चन्द्रगुप्त ! यह तो आप जानते ही हैं कि हम लोगों का मलयकेतु का कुछ दिन तक सम्बन्ध रहा है । इस से उस के प्राण तो बचाने ही चाहिए । २०
राजा ।—( चाणक्य का मुह देखता है )
चाणक्य ।--महाराज ! अमात्य राक्षस का पहिली बात तो सर्व्वथा माननी ही चाहिये ( पुरुष से ) अजी ! तुम भद्रभटादिको से कह दो कि “अमात्य राक्षस के कहने से महाराज चन्द्रगुप्त मलयकेतु को उस के पिता २५

१४८ मुद्राराक्षस -

का राज्य देते हैं” इस से तुम लोग खग जा कर उस को राज पर बिठा आश्रो।
पुरुष ।—जो आज्ञा।
चाणक्य ।—अजी अभी ठहरो, सुनो ! विजयपाल दुर्गपाल से यह कह दो कि अमात्य राक्षस के शस्त्र ग्रहण से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त यह आज्ञा करते हैं कि “चन्दनदास को सब नगरो का जगत्सेठ कर दो।”
पुरुष ।—जो आज्ञा (जाता है)।
चाणक्य ।—चन्द्रगुप्त ! अब और मै क्या तुम्हारा प्रिय करू ?
१० राजा ।—इस से बढ़ कर और क्या भला होगा ?

मैत्री राक्षस सों भई, मिल्यौ अकटक राज।
नन्द नसे सब अब कहा, यासो बढि सुखसाज ॥

चाणक्य ।—(प्रतिहारी से) विजये ! दुर्गपाल विजयपाल से कहो कि “अमात्य राक्षस क मेल से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा करते हैं कि हाथी, घोड़ो को छोड कर और सब बन्धुओ का बन्धन छोड़ दो” वा जब अमात्य राक्षस मन्त्री हुए तब अब हाथी घोड़ो का क्या सोच है ? इस से—

छोड़ौ सब गज तुरग अब, कछु मत राखौ बाधि।
२० केवल हम बाधत सिखा, निज प्रतिज्ञा साधि ॥
(शिखा बाघता है)

प्रतिहारी ।—जो आज्ञा (जाती है)।
चाणक्य ।—अमात्य राक्षस ! मै इस से बढ़ कर और कुछ भी आप का प्रिय कर सकताहूँ ?

सप्तम अङ्क । १४६

सप्तम अङ्क । १४६

राक्षस।—इस से बढ कर और हमारा क्या प्रिय होगा ? पर जो इतने पर भी सन्तोष न हो तो यह आशीर्वाद सत्य हो—

‘ वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरुपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिम्प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री।
म्लेच्छैरुद्वेज्यमाना भुजयुगमधुना पीवर राजमूर्त्ते ः ५
स श्रीमद्बन्धुभृत्यश्चिरमवतु महीम्पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः ॥”

( सब जाते हैं )

सप्तम अंक समाप्त हुआ।

॥ इति ॥

APPENDIX A

उपसंहार (अक्षर) क ।

इस नाटक मे आदि अन्त तथा अङ्कों के विश्रामस्थल में रंगशाला मे ये गीत गाने चाहिए । यथा—

सब के पूर्व्व मङ्गलाचरण में ।
( ध्रुवपद चौताला )

५ जय जय जगदीस राम, श्याम धाम पूर्ण काम, आनन्द घन ब्रह्म विष्णु, सत् चित सुखकारी । कस रावनादि काल, सतत प्रनत भद्रपाल, सोभित गल मुकुमाल, दीनतापहारी ॥ प्रेम सरन पापहरन, असरन जन सरन चरन, सुखहि करन दुखहि दरन, वृन्दावनचारी । रमावास जगनिवास, राम रमन
१० समनत्रास, बिनवत हरिचन्द दास, जय जय गिरधारी ॥ १ ॥

( प्रस्तावना के अन्त मे प्रथम अङ्क के आरम्भ मे )
( चाल लखनऊ की ठुमरी “शाहजादे आलम तेरे लिये” इस चाल की )

जिनके हितकारक पण्डित हैं तिन कों कहा सत्रुन को डर है ।
१५ समुझैं जग में सब नीतिन्ह जो तिन्हें दुर्ग बिदेश मनो घर है ।
जिन मित्रता राखी है लायक सो तिनकों तिनकाहू महासर है ।
जिनकी परतिज्ञा टरै न कबौ तिनकी जय ही सब ही थर है॥२॥

( प्रथम अङ्क की समाप्ति और दूसरे अङ्क के प्रारम्भ मे )

उपसंहार ( अक्षर ) क । १५१

जग मै घर की फूट बुरी । घर के फूटहि सों बिनसाई सुबरन लंकपुरी ॥ फूटहि सों सब कौरव नासे भारत युद्ध भयो । जाको घाटो या भारत मै अब लौ नहि पुजयो ॥ फूट हि सों जयचन्द बुलायो जवनन भारत धाम । जाको फल अबलौ भोगत सब आरज होइ गुलाम ॥ फूटहि सों नवनन्द ५ बिनासे गया मगध को राज । चन्द्रगुप्त को नासन चाह्यो आपु नसे सहसाज ॥ जो जग मै धन मान और बल आपुनो राखन होय । तो अपने घर मै भूलेहू फूट करौ मति कोय ॥३॥ ( दूसरे अङ्क की समाप्ति और तीसरे अङ्क के आरम्भ में ) जग मै तेई चतुर कहावैं । जे सब विधि अपने कारज को १० नीको भांति बनावै ॥ पढ़्यौ लिख्यौ किन होइ जुपै नहि कारज साधन जानै । ताही कों मूरख या जग मै सब कोऊ अनुमानै ॥ छल मै पातक होत जदपि यह शास्त्रन मै बहु गायो । पे अरि सों छल किए दोष नहि मुनियन यहै बताया ॥४॥ ( तीसरे अङ्क की समाप्ति और चतुर्थ अङ्क के आरम्भ मे ) १५ ठुमरी—तिन को ना कछू कबहुं बिगरै, गुरु लोगन को कहनो जे करैं । जिन कों गुरु पन्थ दिखावत है ते कुपन्थ पै भूलि न पाव धरैं ॥ जिन कों गुरु अच्छत आप रहैं ते बिगारे न बैरिन के बिगरैं । गुरु को उपदेस सुनौ सब ही, जग कारज जासों सबै समरै ॥ ५ ॥ २० ( चतुर्थ अङ्क की समाप्ति और पंचम अङ्क के आरम्भ मे ) पूरबी—करि मूरख मित्र मिताई, फिर पछुतैहो रे भाई । अंत दगा खैहौ सिर धुनिहौ रहिहौ सबै गँवाई ॥ मूरख जो कछु हितहू करै तो तामै अन्त बुराई । उलटो उलटो काज करत सब दैहै अंत नसाई ॥ लाख करौ हित मूरख सों पै २५ नाहि न कछु समझाई । अन्त बुराई सिर पै ऐहै रहि जैहो मुह बाई ॥ फिर पछितैहो रे भाई ॥ ६ ॥

१५२ मुद्राराक्षस-

( पञ्चम अंक की समाप्ति और षष्ठ अंक के आरम्भ मे )
काफी ताल होली का।

छुलियन सों रहो सावधान नहि तो पछताओगे। इन की बातन मै फसि रहिहौ सबहि गवाओगे ॥ स्वारथ लोभी जन
५ सों आखिर दगा उठाओगे। तब सुख पैहो जब साचन सों नेह बढाओगे ॥ छुलियन सों० ॥ ७ ॥

( छठे अङ्क की समाप्ति और सातवे अङ्क के आरम्भ मे )
'जिन के मन मे सिय राम बसै' इस धुन की )

जग सूरज चंद टरै तो टरै पे न सज्जननेहु कबो बिचलै।
१० धन संपति सर्बस गेह नसौ नहि प्र म की मेड सों एड् टलै ॥
सतवा दिन कौ तिन का सम प्रान रहै तो रहै वा ढलै तो ढलै।
निज मीत का प्रीत प्रतीत रहौ इक और सब जग जाउ भलै ॥ ८ ॥

( अन्त मे गाने को ) ( बिहाग—श्लोक के अर्थ अनुसार )
१५ हरौ हरि रूप सबै जग बाधा। जा सरूप सों धरनि उधारी निज जन कारज साधा ॥ जिमि तब दाढ अग्र लै राखी महि हति असुर गिरायो। कनक दृष्टि म्लेच्छन हू। तमि किन अब लौं मारि नसायो ॥ आरज राज रूप तुम तासों मागत यह वरदाना। प्रजा कुमुदगन चन्द्र नृपति को करहु सकुल
२० कल्याना ॥ ६ ॥

( बिहाग ठुमरी )

पूरी अमी की कटोरिया सी चिरजीओ सदा विक्टोरिय रानी। सूरज चंद प्रकास करैं जब लौं रहै सात हू सिन्धु म पानी ॥ राज करौ सुख सांतवलो निज पुत्र औ पौत्र समेत
२५ सयानी। पालौ प्रजागन कों सुख सों जग कीरति गान कर गुन गानी ॥ १० ॥

उपसंहार ( उत्तर ) क । १५३

कलिगड़ा—लहौ सुख सब बिधि भारतवासी । विद्या कला जगत की सीखौ तजि आलस की फासी ॥ अपनो देस धरम कुल समुझहु छोड़ि वृत्ति निज दासी । उद्यम करिकै होहु एक मति निज बल बुद्धि प्रकासी ॥ पचपीर की अगति छाड़ि कै ह्वै हरिचरन उपासी । जग के और नरन सम येऊ ५ होउ सबै गुनरासी ।

APPENDIX B.

उपसंहार ( अक्षर ) ख ।

इस नाटक के विषय मे विल्सन साहिब लिखते है कि यह नाटक और नाटकों से अति विचित्र है, क्योंकि इस में सम्पूर्ण राजनीति के व्यवहारों का वर्णन है। चन्द्रगुप्त (जो यूनानी लोगो का सैन्ड्रोकोत्तस Sandrocottus है) और पाटलिपुत्र, (जो यूरप की पालीबोत्तरा Palibothra है) के वर्णन का ऐतिहासिक नाटक होने के कारण यह विशेष दृष्टि देने के योग्य है।

इस नाटक का कवि विशाखदत्त, महाराज पृथु का पुत्र और सामन्त वटेश्वरदत्त का पौत्र था। इस लिखने से अनुमान होता है कि दिल्ली के अन्तिम हिन्दूराजा पृथ्वीराज चौहान ही का पुत्र विशाखदत्त है, क्योंकि अन्तिम श्लोक से विदेशी शत्रु की जय की ध्वनि पाई जाती है, भेद इतना ही है कि रायसे मे पृथ्वीराज के पिता का नाम सोमेश्वर और दादा का आनन्द लिखा है। मै यह अनुमान करता हूं कि सामन्तवटेश्वर इतने बड़े नाम को कोई शीघ्रता मे या लघु कर के कहे तो सोमेश्वर हो सकता है और सम्भव है कि चन्द ने भाषा मे सामन्त वटेश्वर को ही सोमेश्वर लिखा हो।

मेजर विल्फर्ड ने मुद्राराक्षस के कवि का नाम गोदावरीतीर निवासी अनन्त लिखा है, किन्तु यह केवल भ्रममात्र है। जितनी प्राचीन पुस्तकें उत्तर वा दक्षिण में मिली, किसी में अनन्त का नाम नही मिला है।

उपसंहार ( उत्तर ) ख । १५५

इस नाटक पर वटेश्वर मैथिल पण्डित की एक टीका भी है। कहते है कि गुहसेन नामक किसी अपर पण्डित की भी एक टीका है, किन्तु देखने में नही आई । महाराज तजौर के पुस्तकालय में व्यासराज यज्वा की एक टीका और है।

चन्द्रगुप्त * की कथा विष्णुपुराण, भागवत आदि पुराणों में और बृहत्कथा मे वर्णित है। कहते है कि विकटपल्ली के राजा चंद्रदास का उपाख्यान लोगों ने इन्हीं कथाओ से निकाल लिया है। ५

महानन्द अथवा महापद्मनन्द भी शूद्रा के गर्भ से था, और कहते है कि चन्द्रगुप्त इस की एक नाइन स्त्री के पेट से पैदा हुआ था। यह पूर्वपीठिका में लिख आए है कि इन लोगो की राजधानी पाटलिपुत्र थी। इस पाटलिपुत्र (पटने) के विषय में यहा कुछ लिखना अवश्य हुआ। सूर्य्यवंशी सुदर्शन + राजा की पुत्री पाटली ने पूर्व में इस नगर को बसाया। कहते हैं कि कन्या के वंध्यापन के दुख और दुर्नाम से छुड़ाने को राजा ने एक नगर बसाकर उस का नाम पाटलिपुत्र रक्खा था। वायुपुराण मे “जरासन्ध के पूर्वपुरुष वसु राजा ने बिहार प्रान्त का राज्य संस्थापन किया” यह लिखा है। कोई कहते है कि “वेदों मे जिस वसु के यज्ञ का वर्णन है वही राज्यगिरि राज्य का संस्थापक है।” (जो लोग चरणाद्रि को राज्यगृह का पर्वत बतलाते हैं उन को केवल भ्रम है।) इस राज्य का प्रारम्भ चाहे जिस तरह हुआ हो पर जरासन्ध ही के समय से १० १५ २०


* प्रियदर्शी, प्रियदर्शन, चंद्र, चन्द्रगुप्त, श्रीचन्द्र, चंद्रश्री, मौर्य, यह सब चन्द्रगुप्त के नाम हैं, और चाणक्य, विष्णुगुप्त, द्रोमिल वा द्रोहिण, अंशुल, कौटिल्य, यह सब चाणक्य के नाम हैं।

+ सुदर्शन, सहस्रबाहु अर्जुन का भी नामान्तर था, किसी २ ने भ्रम से पाटला को शूद्रक की कन्या लिखा है।

१५६ मुद्राराक्षस-

यह प्रख्यात हुआ। मार्टिन साहब ने जरासन्ध ही के विषय मे एक अपूर्व कथा लिखी है। वह कहते हैं कि जरासन्ध दो पहाडियों पर दो पैर रख कर द्वारका मे जब स्त्रिया नहाती थी तो ऊचा होकर उन को घूरता था। इसी अपराध पर ५ श्रीकृष्ण ने उस को मरवा डाला ! ! ! मगध शब्द मग से बना है। कहते हैं कि "श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने शाकद्वीप से मग जाति के ब्राह्मणों को अनु ष्ठान करने को बुलाया था और वे जिस देश मे बसे उस की मगध सज्ञा हुई।" जिन अगरेज विद्वानों ने 'मगध देश' १० शब्द को मद्ध (मध्यदेश) का अपभ्रंश माना है उन्ह शुद्ध भ्रम हो गया है जैसा कि मेजर विल्फर्ड पालीबोत्रा को राजमहल के पास गङ्गा और कोसी के सङ्गम पर बतलाते और पटने का शुद्ध नाम पद्मावती कहते हैं। यों तो पाली इस नाम के कई शहर हिन्दुस्तान मे प्रसिद्ध हैं किन्तु पालीबोत्रा पाट १५ लिपुत्र ही है। सोन के किनारे मावलीपुर एक स्थान है जिस का शुद्ध नाम महाबलीपुर है। महाबली नन्द का नामान्तर भी है, इसी से और वहा प्राचीन चिन्ह मिलने से कोई कोई शंका करते हैं, कि बलीपुर वा बलीपुत्र का पालीबोत्रा अप- भ्रंश है, किन्तु यह भी भ्रम ही है। राजाओ के नाम से अनेक २० ग्राम बसते हैं इस मे कोई हानि नही, किन्तु इन लोगों की राजधानी पाटलिपुत्र ही थी। कुछ विद्वानों का मत है कि मग लोग मिश्र से आए और यहा आकर siris और Osiris नामक देव और देवी की पूजा प्रचलित की। यह दोनों शब्द ईश और ईश्वरी के अप २५ भ्रंश बोध होते हैं। किसी पुराण मे "महाराज दशरथ ने शाकद्वीपियों को बुलाया" यह लिखा है। इस देश मे पहले कोल और चेरु (चोल) लोग बहुत रहते थे। शूनक और

उपसंहार ( उत्तर ) ख ' १५७

अजक इस वंश में प्रसिद्ध हुए। कहते हैं कि इन दोनों को लड़ कर ब्राह्मण ने निकाल दिया। इसी इतिहास से भुइहार जाति का भी सूत्रपात होता है और जरासन्ध के यज्ञ में भुइहारों की उत्पत्ति वाली किम्बदन्ती इस का पोषण करती है। बहुत दिन तक ये युद्धप्रिय ब्राह्मण यहां राज्य करते रहे। किन्तु एक जैन पण्डित 'जो ८०० वर्ष ईसामसीह के पूर्व हुआ है' लिखता है कि इस देश के प्राचीन राजा को मग नामक राजा ने जीत कर निकाल दिया। कहते हैं कि बिहार के पास बारागज में इसके किले का चिन्ह भी है। यूनानी विद्वानों और वायु पुराण के मत से उदयाश्व ने मगधराज संस्थापन किया। इसका समय ५५० ई० पू० बतलाते हैं और चन्द्रगुप्त को इस से तेरहवां राजा मानते हैं। यूनानी लोगों ने सोन का नाम Erannobaos (इरन्नोबाओस लिखा है), यह शब्द हिरण्यवाह का अपभ्रंश है। हिरण्यवाह, स्वर्णनद और शोण का अपभ्रंश सोन है। मेगास्थिनस अपने लेख में पटने के नगर को ८० स्टेडिया (आठ मील) लम्बा और १५ चौड़ा लिखता है, जिस से स्पष्ट होता है कि पटना पूर्वकाल ही से लम्बा नगर है * उस ने उस समय नगर के चारों ओर ३० फुट गहरी खाई, फिर ऊंची


* जिस पटने का वर्णन उस काल के यूनानियों ने उस समय इस धूम से किया है उस की वर्तमान स्थिति यह है। पटने का जिला २४° ५८′ से २५° ४२′ लैटि० और ८४° ४४′ से ८६° ०५′ लौंगि० पृथ्वी २१०१ मील समचतुष्कोण १५५६६३८ मनुष्य संख्या। पटने की सीमा उत्तर गंगा, पश्चिम सोन, पूर्व मुंगेर का जिला और दक्षिण गया का जिला। नगर की बस्ती अब सवा तीन लाख मनुष्य और बावन हजार घर हैं। साढ़े आठ लाख मन के लगभग बाहर से प्रतिवर्ष यहां माल आता और पांच लाख मन के लगभग जाता है। हिन्दुओं में छः जातियां यहां विशेष हैं। यथा एक लाख अस्सी हजार ग्वाला, एक लाख सत्तर हजार कुनबी, एक लाख सत्रह हजार भुइहार, पचासी हजार चमार, अस्सी हजार काइरी और आठ हजार राजपूत, अब दो लाख के आस पास मुसलमान पटने के ज़िले में बसते हैं।

१५८ मुद्राराक्षस—

दीवार और उस मे ५७० बुर्ज और ६४ फाटक लिखे है। यूनानी लोग जो इस देश को Prassi प्रास्सि कहते है वह पलाशी का अपभ्रंश बोध होता है, क्योंकि जैनग्रन्थों मे उस भूमि के पलाश वृत्त से आच्छादित होने का वर्णन देखा गया है। ५ जैन और बौद्धों से इस देश से और भी अनेक सम्बन्ध हैं। मसीह से छ सौ बरस पहले बुद्ध पहले पहल राजगृह ही मे उदास हो कर चले गए थे। उस समय इस देश की बड़ी समृद्धि लिखी है और राजा का नाम बिम्बसार लिखा है। (जैन लोग अपने बीसवे तीर्थङ्कर सुव्रत स्वामी का राजगृह में १० कल्याणक भी मानते है)। बिम्बसार ने राजधानी के पास ही इनके रहने को कलंद नामक बिहार भी बना दिया था फिर अजातशत्रु और अशोक के समय मे भी बहुत से स्तूप बने। बौद्धों के बडे बडे धर्मसमाज इस देश मे हुए। उस काल में हिन्दू लोग इस बौद्ध धर्म के अत्यन्त विद्वेषी थे। क्या १५ आश्चर्य्य है कि बुद्धों के द्वेष ही से मगध देश को इन लोगों ने अपवित्र ठहराया हो और गौतम की निन्दा ही के हेतु अहल्या की कथा बनाई हो।

भारत नक्षत्र नक्षत्री राजा शिवप्रसाद साहब ने अपने

इतिहास तिमिरनाशक के तीसरे भाग मे इस समय और देश २० के विषय में जो लिखा है वह हम पीछे प्रकाशित करते है। इस से बहुत सी बाते उस समय की स्पष्ट हो जायगी।

प्रसिद्ध यात्री हिआन सांग सन ६३७ ई० मे जब भारत

वर्ष मे आया था तब मगध देश हर्षवर्द्धन नामक कन्नौज के राजा के अधिकार मे था। किन्तु दूसरे इतिहासलेखक सन् २५ २०० से ४०० तक बौद्ध कर्णवंशी राजाओ को मगध का राजा बतलाते है और अन्ध्रवंश का भी राज्यचिन्ह सम्भलपुर मे दिखलाते हैं।

उपसंहार (अक्षर ख। १५६

सन् १२६२ ई० मे पहिले इस देश मे मुसलमानों का राज्य हुआ। उस समय पटना, बनारस के बन्दावत राजपूत राजा इन्द्रदमन के अधिकार मे था। सन् १२२५ मे अलतिमश ने गयासुद्दीन को मगध प्रान्त का स्वतन्त्र सूबेदार नियत किया। इस के थोड़े ही काल पीछे फिर हिन्दू लोग स्वतन्त्र हो गए। ५ फिर मुसलमानों ने लडकर अधिकार किया सही, किन्तु झगड़ा नित्य होता रहा। यहा तक कि सन् १३६३ मे हिन्दू लोग स्वतन्त्र रूप मे फिर यहा के राजा हो गए और तीसरे महमूद की बड़ी भारी हार हुई। यह दो सौ बरस का समय भारतवर्ष का पैलेस्टाइन का समय था। इस समय में गया के उद्धार के १० हेतु कई महाराणा उदयपुर के देश छोड़ कर लड़ने आए *।


* गया के भूगोल में पण्डित शिवनारायण त्रिवेदी भी लिखते हैं—"औरंगाबाद से तीन कोस अग्निकोण पर देव बडी भारी बस्ती है। यहां श्रीभगवान सूर्यनारायण का बड़ा भारी सगीन पश्चिम रुख का मन्दिर है। यह मन्दिर देखने से बहुत प्राचीन जान पड़ता है। यहां कातिक और चैत को छठ को बडा मेला लगता है। दूर दूर के लोग यहां आते और अपने लड़कों का मुण्डन छेदन आदि की मनौती उतारते हैं। मन्दिर से थोड़ी दूर दक्खिन बाजार के पूरब ओर सूर्य्यकुण्ड का तालाब है। इस तालाब से सटा हुआ और एक कच्चा तालाब है उस में कमल बहुत फूलते हैं। व राजनी है। यहां के राजामहाराजा उदयपुर के घराने के मडियार राजपूत हैं। इस घराने के लोग सिपाहगरी के काम में बहुत प्रसिद्ध होते आये हैं। यहां के महाराज श्रीजयप्रकाश सिंह के० सी० एस० आई० बड़े शूर सुशील और उदार मनुष्य थे। यहां से दो कोस दक्खिन कञ्चनपुर में राजा साहिब का बाग और मकान देखने लायक बना है। देव से तीन कोस पूरब उमगा एक छोटी सी बस्ती है, उस के पास पहाड़ के ऊपर देव के सूर्य्यमन्दिर के ढंग का एक महादेव का मंदिर है। पहाड़ के नीचे एक टूटा गढ़ भी देख पड़ता है। जान पड़ता है कि पहले राजा देव के घराने के लोग यहां ही रहते थे, पीछे देव में बसे, देव और उमगा दोनो इन्हीं के राजधानी थी, इस से दोनो नाम साथ ही बोले जाते हैं (देवमूगा)। तिल संक्रान्ति को उमगा में बड़ा मेला लगता है।" इससे स्पष्ट हुआ कि उदयपुर से जो राणा लोग आये उन्ही के खानदान में देव के राजपूत हैं। और बिहारदर्पण से भी यह बात पाई जाती है कि मटियारे लोग मेवाड से आये हैं।

१६० मुद्राराक्षस -

ये और पञ्जाब से लेकर गुजरात दक्षिण तक के हिन्दू मगध देश मे जाकर प्राणत्याग करना बडा पुण्य समझते थे। प्रजा पाल नामक एक राजा ने सन् १४०० के लगभग बोस बरस मगध देश को स्वतन्त्र रक्खा। किन्तु आय्यमत्सरी दैव ने यह स्वतन्त्रता स्थिर नही रक्खी और पुण्यधाम गया फिर मुसलमानों के अधिकार में चला गया। सन् १४७८ तक यह प्रदेश जौनपुर के बादशाह के अधिकार म रहा। फिर बहलोलवश ने इस को जीत लिया था, किन्तु १०६१ मे सनशाह ने फिर जीत लिया। इस के पीछे बगाल के पठानां से और जोनपुर वालों से कई लड़ाई हुई और १४६४ मे दोनों राज्य मे एक सुलहनामा हो गया। इस के पीछे सूर लोगों का अधिकार हुआ और शेरशाह ने बिहार छोड कर पटने को राजधानी किया। सूरों के पीछे क्रमान्वय से (१५७५ ई०) यह देश मुगलों के अधीन हुआ और अन्त में जरासन्ध और चन्द्रगुप्त की राजधानी पवित्र पाटलिपुत्र ने आर्य्य वेश और आर्य्य नाम परित्याग कर के औरङ्गजेब के पोते अजीमशाह के नाम पर अपना नाम अजीमाबाद प्रसिद्ध किया। (१६६७ ई०) बगाले के सूबेदारो में सब से पहले सिराजुद्दौला ने अपने को स्वतन्त्र समझा था किन्तु १७५७ ई० की पलासी की लडाई मे मीरजाफर अङ्गरेजो के बल से बिहार, बगाला और उडीसा का अधिनायक हुआ। किन्तु अन्त मे जगद्विजयी अङ्गरेजो ने सन १७६३ मे पूर्व मे पटना अधिकार करके दूसरे बरस बक्सर की प्रसिद्ध लड़ाई जीत कर स्वतन्त्र रूप से सिहचिन्ह की ध्वजा की छाया के नीचे इस देश के प्रात मात्र को हिन्दुस्तान के मानचित्र मे लाल रङ्ग से स्थापित कर दिया।

उपसंहार ( अक्षर ) ख । १६१

जस्टिन (Justin) कहता है—(१) सन्द्रकुत्तस महापराक्रमी था। असंख्य सैन्य संग्रह कर के विरुद्ध लोगों का इसने सामना किया था। डियोडारस सिक्यूलस (Deodorus Siculus) कहता है—(२) प्राच्यदेश के राजा जन्द्रमा के पास २०००० अश्व, २००००० पदाति, २००० रथ और ४००० हाथी थे। यद्यपि यह Xandramas शब्द चन्द्रमा का अपभ्रंश है, किन्तु कई भ्रान्त यूनानियों ने नन्द को भी इसी नाम से लिखा है। क्विन्तस करशिअस (Quintus Curtius) लिखता है—(३) चन्द्रमा के जौरकार पिता ने पहले मगध राज को फिर उस के पुत्रों को नाश कर के रानी के गर्भ से अपने उत्पन्न किए हुए पुत्र को गद्दी पर बैठाया। स्ट्राबो (Strabo) कहता है—४) सेल्युकस ने मेगास्थनिस को सन्द्रकुत्तस के निकट भेजा और अपना भारतवर्षीय समस्त राज्य देकर उस से सन्धि कर लिया। ओरियन (Orriun) लिखता है—(५) मेगास्थनिस अनेक बार सन्द्रकुत्तस की सभा मे गया था। प्लूटार्क (Plutarch) ने (६) चन्द्रगुप्त को दो लक्ष सेना का नायक लिखा है। इन सब लेखो को पौराणिक वर्णनों से मिलाने से यद्यपि सिद्ध होता है कि सिकन्दरकृत पुरुपराजय के पीछे मगधराज मन्त्री द्वारा निहत हुए और उनके लड़के भी उसी गति को पहुंचे और उसके पीछे चन्द्रगुप्त राजा हुआ, किन्तु बहुत से यूनानी लेखकों ने


(1) Justin His Phellipp Lib XV Chap IV
(2) Deodorus Siculus XVII 93
(3) Quintus Curtius IX 2
(4) Strabo XV 2 9
(5) Orriun Indica X 5
(6) Plutarch Vita Alexandri O. 62

१६२ मुद्राराक्षस—

चन्द्रगुप्त को पट्टरानी के गर्भ मे औरकार से उत्पन्न लिख कर व्यर्थ अपने को भ्रम मे डाला है। चन्द्रगुप्त क्षत्रियवीर्य से दासी मे उत्पन्न था यह सब साधारण का सिद्धान्त है। (७) इस क्रम से ३२७ ई० पू० मे नन्द का मरण और ३१४ ई० पू० मे चन्द्र- ५ गुप्त का अभिषेक निश्चय होता है। पारसदेश की कुमारी के गर्भ से सिल्यूकस को जो एक अति सुन्दर कन्या हुई थी वही चन्द्रगुप्त को दी गई। ३०२ ई० पू० मे यह सन्धि और विवाह हुआ इसी कारण अनेक यवनसेना चन्द्रगुप्त के पास रहती थी। २६२ ई०पू० मे चन्द्रगुप्त २४ बरस राज्य कर के मरा।

१० चन्द्रगुप्त के इस मगधराज्य को आइनेअकबरी मे मकता लिखा है। डिग्विगनेस ( Deguignes ) कहता है कि चीनी मगध देश को मकियात कहते है। केम्फर ( Kemfer ) लिखता है कि जापानी लोग उस को मगत् कफ कहते ह । ( कफ शब्द जापानी मे देशवाची है।) प्राचीन फारसी लेखकों १५ ने इस देश का नाम मावाद वा मुवाद लिखा है। मगधराज्य में अनुगाग प्रदेश मिलने ही से तिब्बतवाले इस देश को अनु खेक वा अनोनाखेक कहते है, और तातारवाले इस देश को एनाकाक लिखते है।

सिसली डिउडारस ने लिखा है, कि मगधराजधानी पाली २० पुत्र भारतवर्षीय हर्क्यूलस (हरि कुल) देवता द्वारा स्थापित हुई। सिसिरो ने हर्क्यूलस (हरिकुल) देवता का नामान्तर बेलस (बल) लिखा है। बल शब्द बलदेव जी का बोध करता है और इन्ही का नामान्तर बली भी है। कहते है कि निज पुत्र अङ्गद के निमित्त बलदेव जी ने यह पुरी निर्माण की,


(७) टाट आदि कई लोगो का अनुमान है कि मेरी वश के चौहान जो बापाराव के पूर्व चित्तोर क राजा थे वे भी मौर्य थे। क्य। चन्द्रगुप्त चौहान था ? या ये मोर। सब शूद्र थ ?

उपसंहार ( अक्षर ) ख । १६३

इसी से बलीपुत्र पुरी इस का नाम हुआ । इसी से पालीपुत्र और फिर पाटलीपुत्र हो गया । पाली भाषा, पाली धर्म, पाली देश इत्यादि शब्द भी इसी से निकले हैं । कहते हैं बाणासुर के बसाए हुए जहा तीन पुर थे उन्हो को जीत कर बलदेव जी ने अपने पुत्रों के हेतु पर निर्माण किए । यह तीनों नगर ५ महाबलीपुर इस नाम से एक मद्रास हाते मे, एक बिदर्भदेश मे ( मुजफ्फरपुर वर्त्तमान नाम ) और एक ( राजमहल वर्त्तमान नाम से ) वङ्गदेश मे है । कोई कोई बालेश्वर, मैसूर, पुरनिया प्रभृति को भी बाणासुर की राजधानी बतलाते हैं । यहा एक बात बड़ी विचित्र प्रकट होती है । बाणासुर भी १० बलीपुत्र है । क्या आश्चर्य है कि पहले उसी के नाम से बली- पुत्र शब्द निकला हो । कोई नन्द ही का नामान्तर महाबली कहते हैं और कहते हैं कि पूर्व मे गङ्गाजी के किनारे नन्द ने केवल एक महल बनाया था, उसके चारों ओर लोग धीरे २ बसने लगे और फिर यह पत्तन ( पटना ) हो गया । कोई १५ महाबली के पितामह उदसी उदासो, उदय, श्रीउदय सिह ( ? ) ने ४५० ई० पू० इस को बसाया मानते हैं । कोई पाटली देवी के कारण पाटलिपुत्र नाम मानते हैं ।

विष्णुपुराण और भागवत में महापद्म के बड़े लडके का नाम सुमाल्य लिखा है । बृहत्कथा मे लिखते हैं कि शकटाल २० ने इन्द्रदत्त का शरीर जला दिया इस से योगानन्द ( अर्थात् नन्द के शरीर मे इन्द्रदत्त की आत्मा ) फिर राजा हुआ । व्याड़ि जाने के समय शकटाल को नाश करने का मन्त्र दे गया था । वररुचि मन्त्री हुआ किन्तु योगानन्द ने मदमत्त हो कर उसको नाश करना चाहा इस से वह शकटार के घर मे २५ छिपा । उस की स्त्री उपकोशा पति को मृत समझ कर सती हो गई । योगानन्द के पुत्र हिरण्यगुप्त के पागल होने पर वररुचि फिर राजा के पास गया था, किन्तु फिर तपोवन में