भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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१०मुद्राराक्षस।

का राक्षस था। शकटार शूद्र और राक्षस * ब्राह्मण था। ये दोनों अत्यन्त बुद्धिमान् और महाप्रतिभासम्पन्न थे। केवल भेद इतना था कि राक्षस धीर और गम्भीर था, उस के विरुद्ध शकटार अत्यन्त उद्धतस्वभाव था। यहां तक कि अपने प्राचीनपने के अभिमान से कभी कभी यह राजा पर भी अपना प्रभुत्व जमाना चाहता। महानन्द भी अत्यन्त उग्रस्वभाव, असहनशील और क्रोधी था, जिस का परिणाम यह हुआ कि महानन्द ने अन्त को शकटार को क्रोधान्ध हो कर बड़े निबिड़ बन्दीखाने में कैद किया और सपरिवार उस के भोजन का केवल दो सेर सत्तू देता था + ।


* बृहत्कथा में राक्षस मन्त्री का नाम कहीं नहीं है, केवल वररुचि से एक मन्त्री राक्षस से मैत्री की कथा यों लिखी है—एक बड़े प्रचण्ड राक्षस पाटलिपुत्र में फिरा करता था। वह एक रात्रि वररुचि से मिला और पूछा कि "इस नगर में कौन स्त्री सुन्दर है ? वररुचि ने उत्तर दिया— जो जिस को रुचे वही सुन्दर है। इस पर प्रसन्न हो कर राक्षस मन्त्री से मित्रता की और कहा कि हम सब बात में तुम्हारी सहायता करेंगे और फिर सदा राजकाज में ध्यान में प्रत्यक्ष होकर राक्षस वररुचि की सहायता करता।

+ बृहत्कथा में यह कहानी और ही चाल पर लिखी है। वररुचि व्याडि और इन्द्रदत्त तीनों को गुरुदक्षिणा देने के हेतु करोड़ों रुपये के सोने की आवश्यकता हुई। तब इन लोगों ने सलाह किया कि नन्द (सत्यनन्द) राजा के पास चल कर उस से माँगना ले। उन दिनों राजा का डेरा अयोध्या में था ये तीनों ब्राह्मण वहां गये, किन्तु दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों राजा मर गया। तब आपस में सलाह करके इन्द्रदत्त योगबल से अपना शरीर छोड़ कर राजा के शरीर में चला गया, जिस से राजा फिर जी उठा। तभी से उसका नाम योगानन्द हुआ। योगानन्द ने वररुचि को करोड़ रुपये देने की आज्ञा किया। शकटार बड़ा बुद्धिमान था उस ने सोचा कि राजा का मरकर जीना और यकबारगी एक अपरिचित को करोड़ रुपया देना इस में हो न हो कोई भेद है। ऐसा न हो कि अपना काम कर के फिर राजा का शरीर छोड़ कर यह चला जाय, यह सोच कर शकटार ने राज्य भर में जितने मुरदे मिले उन को जलवा दिया, उसी में इन्द्रदत्त का भी शरीर जल गया। तब व्याडि ने यह वृत्तान्त योगानन्द से कहा कि