भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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पूर्व्वकथा । ११

शकटार ने बहुत दिन तक महा-मात्य का अधिकार भोगा था, इस से यह अनादर उस के पक्ष मे अत्यन्त दुखदाई हुआ। नित्य सत्तू का बरतन हाथ मे लेकर अपने परिवार से कहता कि जो एक भी नन्दवंश के जड़ से नाश करने मे समर्थ हो वह यह सत्तू खाय । मन्त्री के इस वाक्य से दुःखित हो कर उस के ५ परिवार का कोई भी सत्तू न खाया । अन्त मे कारागार की पीड़ा से एक एक कर के उस के परिवार के सब लोग मर गए ।

एक तो अपमान का दुख, दूसरे कुटुम्ब का नाश, इन दोनो कारणो से शकटार अत्यन्त तनछीन मनमलीन दीन हीन हो १० गया। किन्तु अपने मनसूबे का ऐसा पक्का था कि शत्रु से बदला लेने की इच्छा से अपने प्राण नही त्याग किए और थोड़े बहुत भोजन इत्यादि से शरीर को जीवित रक्खा । रात दिन इसी सोच मे रहता कि किस उपाय से वह अपना बदला ले सकेगा। १५

कहते है कि राजा महानन्द एक दिन हाथ मुह धोकर हंसते हसते जनाने मे आ रहे थे। विचक्षणा नाम की एक दासी जो राजा के मुह लगने के कारण कुछ धृष्ट हो गई थी, राजा को हसता देख कर हस पड़ी । राजा उस की ढिठाई से बहुत चिढ़ा और उस से पूछा—तू क्यों हसी ? उस ने उत्तर २० दिया—"जिस बात पर महाराज हँसे उसी पर मै भी हसी"। महानन्द इस बात पर और भी चिढ़ा। और कहा कि अभी बतला मैं क्यों हंसा, नही तो तुझ को प्राणदण्ड होगा । दासी से और कुछ उपाय न बन पड़ा और उसने घबड़ा कर इस के


यह सुन कर पहिले तो दुःखी हुआ फिर वररुचि को अपना मत्री बनाया। परन्तु अन्त में शकटार की उग्रता से सन्तप्त हो कर उस को अन्धे कुए में कैद किया । बृह- कथा में शकटार के स्थान पर शकटाल नाम लिखा है।