मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ मुहूर्तचिन्तामणि त्रिंशांश शुक्रज्ञजीवशनिभूतनयस्य बाण- शैलाष्टपञ्चविशिखाः समराशिमध्ये । त्रिंशांशको विषमभे विपरीतमस्माद् द्रेष्काणकाः प्रथमपञ्चनवाधिपानाम् ॥ ३९ ॥ अन्वयः—समराशिमध्ये बाणशैलाष्टपञ्चविशिखाः (अंशाः) (क्रमेण) शुक्रज्ञजीव- शनिभूतनयस्य त्रिंशांशका (भवन्ति), विषमभे अस्मात् विपरीतं तथा प्रथमपञ्चन- वाधिपानां द्रेष्काणकाः (भवन्ति) ॥ ३६ ॥ वृष-कर्कादि सम राशियों में पहिले पाँच अंशों का स्वामी शुक्र, तदनन्तर सात अंशों का स्वामी बुध, तदनन्तर आठ अंशों का स्वामी बृहस्पति, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शनैश्चर, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी मंगल होता है। मेष-मिथुनादि विषम राशियों में इससे विपरीत अर्थात् पहिले पाँच अंशों का स्वामी मंगल, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शनैश्चर, तदनन्तर आठ अंशों का स्वामी बृहस्पति, तदनन्तर सात अंशों का स्वामी बुध, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शुक्र होता है ॥ ३९ ॥ त्रिंशांश चक्र
| ग्रह | शु० | बु० | बृ० | श० | मं० | ईश |
|---|---|---|---|---|---|---|
| समगृह | ५ | ७ | ८ | ५ | ५ | अंश |
| ग्रह | मं० | श० | बृ० | बु० | शु० | ईश |
| विषमगृह | ५ | ५ | ८ | ७ | ५ | अंश |
| द्रेष्काण | ||||||
| दश अंशों का एक द्रेष्काण होता है। एक राशि में तीन द्रेष्काण होते | ||||||
| हैं। जिस राशि में द्रेष्काण जानना हो उस राशि का स्वामी ही पहिले | ||||||
| द्रेष्काण का स्वामी होता है, और उससे पाँचवीं राशि का स्वामी दूसरे | ||||||
| द्रेष्काण का, और नवीं राशि का स्वामी तीसरे द्रेष्काण का स्वामी होता |