मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
DevanagariHindipublished207 पृष्ठ
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१२० मुहूर्तचिन्तामणि द्वादशांश चक्र
| मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २।३० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० |
| ५ | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० |
| ७।३० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मो० | मे० | वृ० |
| १० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० |
| १२।३० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० |
| १५ | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० |
| १७।३० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० |
| २० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिंह | कं० | तु० |
| २२।३० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० |
| २५ | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० |
| २७।३० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० |
| ३० | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ |
| षड्वर्ग | ||||||||||||
| राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, और त्रिंशांश ये छः षड्वर्ग | ||||||||||||
| कहे जाते हैं। षड्वर्ग शुभ ग्रहों से शुभ और पाप ग्रहों से अशुभ हो जाता | ||||||||||||
| है, अर्थात् यदि शुभ ग्रह शुभ ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो | ||||||||||||
| तो शुभ फल होता है और शुभ ग्रह पाप ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि | ||||||||||||
| में, अथवा पाप ग्रह शुभ ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो तो | ||||||||||||
| सम फल होता है। और पाप ग्रह पाप ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में | ||||||||||||
| स्थित हो तो अशुभ फल होता है ॥४०॥ | ||||||||||||
| नक्षत्रों की पूर्वार्द्धयोग आदि संज्ञा और उनका फल | ||||||||||||
| पौष्णेशाक्राद्रससूर्यनन्दाः पूर्वार्द्धमध्यापरभागयुग्मम् । | ||||||||||||
| भर्त्ता प्रियःप्राग्युजिभे स्त्रियाः स्यान्मध्ये द्वयोः प्रेमपरे प्रिया स्त्री ॥ ४१ ॥ | ||||||||||||
| अन्वयः—पौष्णेशाक्रात् रससूर्यनन्दाः (क्रमात्) पूर्वार्द्धमध्यापरभागयुग्मं (स्यात्) | ||||||||||||
| प्राग्युजिभे स्त्रियाः भर्त्ता प्रियः स्यात् । मध्ये द्वयोः प्रेम (भवति) परे (भर्तुः) स्त्री | ||||||||||||
| प्रिया भवति ॥ ४१ ॥ |