मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
१२० मुहूर्तचिन्तामणि द्वादशांश चक्र
| मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २।३० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० |
| ५ | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० |
| ७।३० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मो० | मे० | वृ० |
| १० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० |
| १२।३० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० |
| १५ | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० |
| १७।३० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० |
| २० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिंह | कं० | तु० |
| २२।३० | ध० | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० |
| २५ | म० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० |
| २७।३० | कुम्भ | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० |
| ३० | मी० | मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुम्भ |
| षड्वर्ग | ||||||||||||
| राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, और त्रिंशांश ये छः षड्वर्ग | ||||||||||||
| कहे जाते हैं। षड्वर्ग शुभ ग्रहों से शुभ और पाप ग्रहों से अशुभ हो जाता | ||||||||||||
| है, अर्थात् यदि शुभ ग्रह शुभ ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो | ||||||||||||
| तो शुभ फल होता है और शुभ ग्रह पाप ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि | ||||||||||||
| में, अथवा पाप ग्रह शुभ ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो तो | ||||||||||||
| सम फल होता है। और पाप ग्रह पाप ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में | ||||||||||||
| स्थित हो तो अशुभ फल होता है ॥४०॥ | ||||||||||||
| नक्षत्रों की पूर्वार्द्धयोग आदि संज्ञा और उनका फल | ||||||||||||
| पौष्णेशाक्राद्रससूर्यनन्दाः पूर्वार्द्धमध्यापरभागयुग्मम् । | ||||||||||||
| भर्त्ता प्रियःप्राग्युजिभे स्त्रियाः स्यान्मध्ये द्वयोः प्रेमपरे प्रिया स्त्री ॥ ४१ ॥ | ||||||||||||
| अन्वयः—पौष्णेशाक्रात् रससूर्यनन्दाः (क्रमात्) पूर्वार्द्धमध्यापरभागयुग्मं (स्यात्) | ||||||||||||
| प्राग्युजिभे स्त्रियाः भर्त्ता प्रियः स्यात् । मध्ये द्वयोः प्रेम (भवति) परे (भर्तुः) स्त्री | ||||||||||||
| प्रिया भवति ॥ ४१ ॥ |
विवाहप्रकरण १२१ रेवती नक्षत्र से लेकर छः, अर्थात् रेवती, अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, इन नक्षत्रों को पूर्वार्द्धयोगि कहते हैं। आर्द्रा से लेकर बारह, अर्थात् आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा- फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा इन नक्षत्रों को मध्ययोगि कहते हैं। ज्येष्ठा से लेकर नव, अर्थात् ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद इन नक्षत्रों को अपरभागयोगि कहते हैं। यदि पहिले-पहिल पुरुष-स्त्री का समागम पूर्वार्द्धयोगि नक्षत्रों में हो तो स्त्री को स्वामी प्रिय होता है। मध्ययोगि नक्षत्रों में हो तो स्त्री-पुरुष दोनों में परस्पर प्रीति होती है और अपरभागयोगि नक्षत्रों में हो तो स्वामी को स्त्री प्यारी होती है ॥ ४१ ॥ स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र का विचार सेव्याधमर्णयुवतीनगरादिभं चेत् पूर्वंहि भृत्यधनिभर्तृ पुरादिसङ्गात् । सेवाविनाशधननाशनभर्तृ नाश- ग्रामादिसौख्यहृदिदं क्रमशः प्रदिष्टम्
१२२ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—ज्येष्ठापौष्णभसार्पभान्त्यघटिकायुग्मं च (तथा) मूलाश्विनीपित्र्यादौ घटिकाद्वयं तद्द्वस्य गण्डान्तकं निगदितम्। कर्कल्यण्डजभान्ततः अर्द्धघटिका, सिंहाश्व- मेषादिगा (अर्द्धघटिका) तथा पूर्णान्ते घटिकात्मकं च (तथा) नन्दातिथेः आदिम- घटिकात्मकं गण्डान्तं अशुभदं (भवेत्) ॥ ४३ ॥ ज्येष्ठा, रेवती और आश्लेषा में अन्त के दो दण्ड तथा मूल, अश्विनी और मघा में आदि के दो दण्ड गंडान्त कहा जाता है। अर्थात् रेवती-अश्विनी आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल इन नक्षत्रों की सन्धि में चार-चार दंड गंडान्त होता है। कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न में अन्त का आधा दण्ड तथा सिंह, धन और मेष में आदि का आधा दण्ड गंडान्त है। अर्थात् मीन-मेष, कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु इन लग्नों की सन्धि में एक-एक दंड गंडान्त होता है। पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी और अमावास्या में अंत का एक दण्ड तथा परीवा, छठि और एकादशी में आदि का एक दण्ड गंडान्त होता है। अर्थात् पूर्णमासी- परीवा, अमावास्या-परीवा, पंचमी-छठि, दशमी-एकादशी, इन तिथियों की सन्धि में दो-दो दंड गंडान्त होता है। गण्डान्त में विवाहादि शुभ कार्य न करना चाहिए। यदि अज्ञान से विवाह किया जाता है तो स्त्री शोक करने- वाली, वन्ध्या अथवा मृतवत्सा होती है। अभिजित्*संज्ञक मुहूर्त्त में विवाहादि शुभ कार्य करे तो गंडान्त दोष नहीं होता ॥ ४३ ॥ कर्तरी दोष लग्नात्पापावृज्वनृजू व्ययार्थस्थौ यदा तदा। कर्तरी नाम सा ज्ञेया मृत्युदारिद्र्यशोकदा ॥ ४४ ॥ अन्वयः—यदा ऋज्वनृजू पापौ लग्नात् व्ययार्थस्थौ (स्याताम्) तदा कर्तरीनाम ज्ञेया। सा मृत्युदारिद्र्यशोकदा (भवति) ॥ ४४ ॥ यदि पापग्रह मार्गी† होकर लग्न से बारहवें स्थान में और दूसरा पाप- ग्रह वक्री‡ होकर लग्न से दूसरे स्थान में स्थित हो तो इसे कर्तरी दोष कहते हैं। विवाहादि शुभ कार्यों में कर्तरी दोष मृत्यु, दारिद्र्य और शोक देने- वाला होता है। ऐसे ही कोई पापग्रह मार्गी होकर चन्द्रमा से बारहवें स्थान में और दूसरा पापग्रह वक्री होकर चन्द्रमा से दूसरे स्थान में स्थित हो तो इसे भी कर्तरी कहते हैं। यह भी पूर्वोक्त फल देनेवाली होती है। इसी रीति से सब भावों की कर्तरी होती है ॥ ४४ ॥ *आगे कहेंगे। †आगे को चलनेवाला। ‡पीछे को लौटनेवाला।
विवाहप्रकरण १२३ संग्रह × दोष चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्र्यं मरणं शुभम् । सौख्यं सापत्न्यवैराग्ये पापद्वययुते मृतिः ॥ ४५ ॥ अन्वयः—चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्र्यं, मरण, शुभं, सौख्यं (स्यात्) सापत्न्य- वैराग्ये (भवतः) तथा पापद्वययुते (चन्द्रे) मृतिः स्यात् ॥ ४५ ॥ विवाहकाल में चन्द्रमा यदि सूर्य के साथ हो तो स्त्री-पुरुष दरिद्र होते हैं, मंगल के साथ हो तो दोनों की मृत्यु, बुध के साथ हो तो शुभ, बृहस्पति के साथ हो तो सुख और शुक्र के साथ हो तो स्त्री के सौत आती है तथा शनैश्चर संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष में प्रीति नहीं होती है । यदि चन्द्रमा दो, तीन अथवा कई पापग्रहों से संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष की मृत्यु होती है । नारदजी ने बुध के योग में सन्तान-हानि, बृहस्पति के योग में भाग्य-हानि, शनैश्चर के योग में संन्यास, राहु के योग में स्त्री-पुरुष का परस्पर झगड़ा और केतु के योग में सदा कष्ट वा दरिद्रता कहा है । यदि चन्द्रमा अपनी उच्च राशि में, अपने मित्र की राशि में अथवा अपनी राशि में स्थित होकर शुभग्रह-संयुक्त हो तो शुभफलकारक और यदि इससे विपरीत हो तो अशुभ- फलकारक होता है ॥ ४५ ॥ अष्टमलग्न का दोष और परिहार जन्मलग्नभयोर्मृत्युराशौ नेष्टः करग्रहः । एकाधिपत्ये राशीशमैत्रे वा नैव दोषकृत् ॥ ४६ ॥ अन्वयः—जन्मलग्नभयोः मृत्युराशौ करग्रहः नेष्टः । एकाधिपत्ये वा राशीशमैत्रे नैव दोषकृत् ॥ ४६ ॥ स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न में विवाह शुभ नहीं होता । यदि जन्मलग्न का स्वामी वा जन्मराशि का स्वामी जन्म- लग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न का भी स्वामी हो अथवा आठवीं लग्न के स्वामी का मित्र हो तो उक्त दोष नहीं होता ॥ ४६ ॥ अन्य परिहार मीनोक्षकर्कलिमृगस्त्रियोऽष्टमं लग्नं यदा नाष्टमगेहदोषकृत् । अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूर्भवेत्सुतायुर्हृत्सौख्यभागिनी ॥ ४७ ॥ × चन्द्रमा के साथ एक राशि में अन्य ग्रहों के रहने का नाम ।
१२४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—मीनोक्षकर्कलिमृगस्त्रियः यदा अष्टमं लग्नं (भवेत्) तदा अष्टम- गेहदोषकृत् न (स्यात्) अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूः सुतायुर्गृहसौख्यभागिनी- भवेत् ॥ ४७ ॥ यदि स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न मीन, वृष, कर्क, वृश्चिक, मकर और कन्या में से कोई हो तो आठवीं लग्न का दोष नहीं होता; क्योंकि ये दोनों परस्पर मित्र अथवा एक ही हैं। उदा- हरण—यथा स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न या जन्मराशि सिंह हो तो उससे आठवीं मीन हुई। सिंह के स्वामी सूर्य और मीन के स्वामी बृहस्पति की परस्पर मित्रता होने के कारण विवाह में दोष नहीं हो सकता। ऐसे ही तुला से आठवीं वृष होती है। तुला और वृष दोनों का स्वामी शुक्र है, इसलिये विवाह में कोई दोष नहीं हो सकता, ऐसे ही कर्कादि को भी जानना चाहिए। यदि ऐसे योग में विवाह हो तो वह स्त्री उत्तम पुत्र, आयु, उत्तम घर और सुख पाती है ॥ ४७ ॥ आठवीं राशि के नवांश और बारहवीं राशि का दोष मृतिभवनांशो यदि च विलग्ने तदधिपतिर्वा न शुभकरः स्यात् । व्ययभवनं वा भवति तदंशस्तदधिपतिर्वा कलहकरः स्यात् ॥ ४८ ॥ अन्वयः—मृतिभवनांशः वा तदधिपतिः यदि विलग्ने (भवेत्) तदा शुभकरः न स्यात् । यदि व्ययभवनं वा तदंशः वा तदधिपतिः यदि (विलग्ने) भवति तदा कलहकरः स्यात् ॥ ४८ ॥ स्त्री वा पुरुष की जन्मराशि से वा जन्मलग्न से आठवीं राशि का नवांश वा आठवीं राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो तो विवाह शुभकारक नहीं होता। ऐसे ही बारहवीं राशि, बारहवीं राशि का नवांश वा बारहवीं राशि का स्वामी यदि लग्न में हो तो स्त्री-पुरुष में परस्पर झगड़ा होता है ॥ ४८ ॥ विषघटी-दोष खरामतो ३० न्यादितिवह्निपित्र्यभे खवेदतः ४० के रदत ३२ श्च सार्पभे । खबाणतो ५० श्वे धृतितो १८ र्यमाम्बुपे कृते २० र्भगत्वाष्ट्रभविश्वजीवभे ॥ ४९ ॥
विवाहप्रकरण १२५ मनो १४ द्विदैवानिलसौम्यशाक्रभे कुपक्षतः २१ शैवकरेऽष्टिट् १६ तोऽजभे । युगाश्वितो २४ बुघ्न्यभतोययाम्यभे खचन्द्रतो १० मित्रभवासवश्रुतौ ॥ ५० ॥ मूलेऽङ्गबाणा ५६ द्विषनाडिकाः कृताः वर्ज्या शुभेऽथो विषनाडिका ध्रुवाः । निघ्ना भभोगेन खतर्क ६० भाजिताः स्फुटा भवेयुर्विषनाडिकास्तथा ॥ ५१ ॥ अन्वयः—अन्त्यादितिवह्निपित्र्यभे खरामतः, के खवेदातः, सार्पभे रदतः, अश्वे खबाणतः, अर्यमाम्बुपये धृतितः, भगत्वाष्ट्रभविश्वजीवभे कृतेः, द्विदैवानिलसौम्यशाक्रभे मनोः, शैवकरे कुपक्षतः, अजभे अष्टिटः, बुघ्न्यभतोययाम्यभे युगाश्वितः, मित्रभवासवश्रुतौ खचन्द्रतः, मूले अङ्गबाणात् कृ
१२६ मुहूर्त्तचिन्तामणि तो सैंतीस दण्ड बत्तीस पल लब्ध हुए। इन्हीं सैंतीस दण्ड बत्तीस पल के बाद चार दण्ड विषनाड़ी होगी। ऐसे ही और भी जानना चाहिए ॥ ४९-५१ ॥ दिन के पन्द्रह मुहूर्त्त गिरिशभुजगमित्राः पित्र्यवस्वम्बुविश्वे- ऽभिजिदथ च विधातापीन्द्र इन्द्रानलौ च निर्ऋतिरुदकनाथोऽप्यर्यमाथो भगः स्यु क्रमशः इह मुहूर्त्ता वासरे बाणचन्द्राः ॥ ५२ ॥ अन्वयः—गिरिशभुजगमित्राः पित्र्यवस्वम्बुविश्वे अभिजित् अथ च विधाता अपि च इन्द्रः इन्द्रानलौ, निर्ऋतिः उदकनाथः, अपि (तथा) अर्यमा अथो भगः इमे बाणचन्द्राः (पञ्चदश) मुहूर्त्ताः क्रमशः वासरे स्युः ॥ ५२ ॥ दिन का जितना मान हो उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड पल लब्ध हों वही एक मुहूर्त्त का मान होता है। पहिले मुहूर्त्त का स्वामी महादेव, दूसरे का सर्प, तीसरे का मित्र नामक सूर्य, चौथे के पितर, पाँचवें के वसु, छठे का जल, सातवें के विश्वेदेव, आठवें का अभिजित्, नवें का विधाता, दशवें का इन्द्र, गेरहवें के इन्द्र और अग्नि, बारहवें का राक्षस, तेरहवें का वरुण, चौदहवें का अर्यमा नामक सूर्य और पन्द्रहवें का भग नामक सूर्य स्वामी है। क्रम से ये पन्द्रह मुहूर्त्त दिन में होते हैं ॥ ५२ ॥ रात्रि के मुहूर्त्त शिवोऽजपादादष्टौ स्युर्भेशा अदितिजीवकौ। विष्ण्वर्कत्वाष्ट्रमरुतो मुहूर्त्ता निशि कीर्तिताः ॥ ५३ ॥ अन्वयः—शिवः अजपादात् अष्टौ भेशाः अदितिजीवकौ विष्ण्वर्कत्वाष्ट्रमरुतः (एते) निशि [रात्रौ] मुहूर्त्ताः स्युः ॥ ५३ ॥ दिनमान को साठ में घटाने पर जो बाकी रहे वह रात्रिमान होता है। उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड-लब्ध हों वह रात्रि में एक मुहूर्त्त का मान होता है। रात्रि में पहिले मुहूर्त्त के स्वामी शिव और दूसरे मुहूर्त्त से लेकर नवें मुहूर्त्त पर्यन्त आठ मुहूर्त्तों के पूर्वभाद्रपद आदि आठ नक्षत्र स्वामी होते हैं, अर्थात् दूसरे मुहूर्त्त के स्वामी अजपाद नामक शिव, तीसरे मुहूर्त्त के अहिर्बुध्न्य नामक शिव, चौथे मुहूर्त्त के पूषा नामक सूर्य, पाँचवें मुहूर्त्त के अश्विनीकुमार, छठे मुहूर्त्त के यम, सातवें मुहूर्त्त के अग्नि, आठवें मुहूर्त्त के
विवाहप्रकरण १२७ ब्रह्मा, नवें मुहूर्त्त के चन्द्रमा, दशवें मुहूर्त्त के अदिति, गेरहवें मुहूर्त्त के बृहस्पति, बारहवें मुहूर्त्त के विष्णु, तेरहवें मुहूर्त्त के सूर्य, चौदहवें मुहूर्त्त के त्वष्टा अर्थात् विश्वकर्मा और पन्द्रहवें मुहूर्त्त का वायु स्वामी है । क्रम से ये पन्द्रह मुहूर्त्त रात्रि में होते हैं ॥ ५३ ॥ आदित्यादि वारों में निषिद्ध मुहूर्त्त रवावर्यमा ब्रह्मरक्षश्च सोमे कुजे वह्निपित्र्ये बुधे चाभिजित्स्यात् । गुरौ तोयरक्षौ भृगौ ब्राह्मपित्र्ये शनावीशसापौ मुहूर्त्ता निषिद्धाः ॥ ५४ ॥ अन्वयः—रवौ अर्यमा, सोमे ब्रह्मरक्षः, कुजे वह्निपित्र्ये, बुधे अभिजित्, गुरौ तोय- रक्षौ, भृगौ ब्राह्मपित्र्ये, शनौ ईशसार्पौ, (इमे) मुहूर्त्ताः निषिद्धाः (ज्ञेयाः) ॥ ५४ ॥ रविवार में अर्यमा नामक मुहूर्त्त, सोमवार में ब्रह्म और राक्षस दो मुहूर्त्त, मङ्गल में अग्नि और पितर दो मुहूर्त्त, बुधवार में अभिजित् नामक मुहूर्त्त, बृहस्पतिवार में जल और राक्षस दो मुहूर्त्त, शुक्रवार में ब्राह्म और पितर दो मुहूर्त्त, शनैश्चर में महादेव और सर्प दो मुहूर्त्त निषिद्ध होते हैं । इन दिनों के इन मुहूर्त्तों में कोई शुभ कार्य न करना चाहिए । इन मुहूर्त्तों का और भी यह प्रयोजन है कि किसी कार्य की आवश्यकता हो और जिस नक्षत्र में उस कार्य के करने को कहा है, वह नक्षत्र उस काल में नहीं है तो उस नक्षत्र के स्वामी के मुहूर्त्त में उस कार्य को कर ले ॥ ५४ ॥ विवाह के नक्षत्र और अभिजित् नक्षत्र का मान निर्वेधैः शशिकरमूलमैत्रपित्र्य- ब्राह्मान्त्योत्तरपवनैः शुभो विवाहः । रिक्तामारहिततिथौ शुभेऽह्नि वैश्व- प्रान्त्याङ्घ्रिः श्रुतितिथिभागतोऽभिजित्स्यात् ॥ ५५ ॥ अन्वयः—निर्वेधैः शशिकरमूलमैत्रपित्र्यब्राह्मान्त्योत्तरपवनैः, रिक्तामारहिततिथौ, शुभे अह्नि, विवाहः शुभः (स्यात्), तथा वैश्वप्रान्त्यांघ्रिः श्रुतितिथिभागतः अभिजित् स्यात् ॥ ५५ ॥ सूर्यादि ग्रहों से विद्ध* नक्षत्रों को छोड़ मृगशिरा, हस्त, मूल, अनुराधा, मघा, रोहिणी, रेवती, तीनों उत्तरा और स्वाती नक्षत्र में चौथ, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या को छोड़ अन्य तिथियों में और शुभ दिन अर्थात् *वेध का प्रकार आगे कहेंगे ।
१२८ मुहूर्त्तचिन्तामणि सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्रवार में विवाह शुभ होता है। उत्तराषाढ़ नक्षत्र के चौथे चरण से लेकर श्रवण के चार दण्ड बीते तक अभिजित् नाम नक्षत्र कहा जाता है ॥ ५५ ॥ ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध वेधोऽन्योन्यमसौ विरिञ्च्यभिजितोर्याम्यानुराधक्षंयो- र्विश्वेन्द्रोर्हरिपित्र्ययोर्ग्रहकृतो हस्तोत्तराभाद्रयोः। स्वातीवारुणयोर्भवेन्निर्रऋतिभादित्यस्तथोपान्त्ययोः खेटे तत्र गते तुरीयचरणाद्योर्वा तृतीयद्वयोः ॥ ५६ ॥ अन्वयः—विरिञ्च्यभिजितोः, याम्यानुराधक्षंयोः, विश्वेन्द्रोः, हरिपित्र्ययोः, हस्तोत्तराभाद्रयोः, स्वातीवारुणयोः, निर्रऋतिभादित्ययोः, तथा उपान्त्ययोः ग्रहकृतः वेधः भवेत्। तत्र गते खेटे तुरीयचरणाद्योः वा (तथा) तृतीयद्वयोः वेधः भवेत् ॥ ५६ ॥ पाँच रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर पाँच आड़ी रेखा और चारों कोनों में दो-दो तिरछी रेखा खींचे, तब जो आकार बन जाता है, उसे पञ्च- शलाका चक्र कहते हैं। इस चक्र में ऊपर बाईं ओर के कोने में खींची हुई दूसरी रेखा के छोर पर कृत्तिका नक्षत्र स्थापित करके फिर दाहिने क्रम से सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी से लेकर भरणी पर्यन्त सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब एक रेखा के दोनों छोरों पर जो नक्षत्र रहते हैं उन दोनों का परस्पर वेध होता है। उदाहरण—यथा रोहिणी और अभिजित् का, भरणी और अनुराधा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, श्रवण और मघा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, स्वाती और शतभिष का, मूल और पुनर्वसु का, उत्तराफाल्गुनी और रेवती का परस्पर वेध होता है। परन्तु यह वेध ग्रहकृत होता है, अर्थात् एक रेखा में स्थित दो नक्षत्रों में से किसी एक में जो ग्रह स्थित हो वह दूसरे को वेधता है। यथा रोहिणी में कोई ग्रह स्थित हो तो वह अभिजित् को वेधता है और अभिजित् में कोई ग्रह स्थित हो तो वह रोहिणी को वेधता है। ऐसा ही वेध सब नक्षत्रों में जानना चाहिये। इसी चक्र में पाद-वेध भी कहते हैं। उसकी रीति यह है कि एक रेखा में स्थित जिन दो नक्षत्रों का परस्पर वेध होता है उनमें से किसी नक्षत्र के चौथे पाद में ग्रह स्थित हो तो वह उसी रेखा में स्थित दूसरे नक्षत्र के पहिले पाद को वेधता है, यदि तीसरे पाद में स्थित हो तो दूसरे पाद को और दूसरे पाद में स्थित हो तो तीसरे पाद को और पहिले
विवाहप्रकरण १२९ पाद में स्थित हो तो चौथे पाद को वेधता है। यथा रोहिणी के पहिले पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के चौथे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के चौथे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के पहिले पाद को वेधता है। इसी तरह अन्यत्र भी पादवेध जानना चाहिए ॥ ५६ ॥ सप्तशलाका चक्र में ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध शाक्रेज्ये शतभानिले जलशिवे पौष्णार्यमर्क्षे वसु- द्वीशे वैश्वसुधांशुभे हयभगे सार्पानुराधे मिथः । हस्तोपान्तिमभे विधातृविधिभे मूलादिती त्वाष्ट्रभा- जाङ्घ्री याम्यमघे कृशानुहरिभे विद्धे कुभृद्रेखिके ॥ ५७ ॥ अन्वयः -कुभृद्रखिके (सप्तशलाके चक्रे) शाक्रेज्ये, शतभानिले, जलशिवे पौष्णार्य- मर्क्षे, वसुद्वीशे, वैश्वसुधांशुभे, हयभगे, सार्पानुराधे, हस्तोपान्तिमभे, विधातृविधिभे, मूलादिती, त्वाष्ट्रभाजांघ्री, याम्यमघे, कृशानुहरिभे, मिथः विद्धे (स्तः) ॥ ५७ ॥ सात रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर सात रेखा आड़ी खींचने से जो आकार बन जाता है उसे सप्तशलाका चक्र कहते हैं। इस सप्तशलाका चक्र में ऊपर बाईं ओर खड़ी रेखा के छोर पर कृत्तिका नक्षत्र को स्थापित करके दाहिने क्रम से सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी आदि भरणीपर्यंत सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब जो एक रेखा के दोनों छोरों पर दो नक्षत्र रहते हैं उनका परस्पर वेध होता है। यथा ज्येष्ठा और पुष्य का, शतभिष और स्वाती का, पूर्वाषाढ़ और आर्द्रा का, रेवती और उत्तरा- फाल्गुनी का, धनिष्ठा और विशाखा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, अश्विनी और पूर्वाफाल्गुनी का, आश्लेषा और अनुराधा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, रोहिणी और अभिजित् का, मूल और पुनर्वसु का, चित्रा और पूर्वाभाद्रपद का, भरणी और मघा का कृत्तिका और श्रवण का परस्पर वेध होता है। यह वेध भी ग्रह के द्वारा होता है अर्थात् एक रेखा के दोनों छोरों पर स्थित दो नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ग्रह उसी रेखा के दूसरे छोर पर स्थित दूसरे नक्षत्र को वेधता है। यथा ज्येष्ठा नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह पुष्य नक्षत्र को वेधता है, अथवा पुष्य ही नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ज्येष्ठा नक्षत्र को वेधता
१३० \t\t मुहूर्त्तचिन्तामणि है। इसी तरह इस सप्तशलाका चक्र में क्रूरग्रह* करके वेधा हुआ नक्षत्र और शुभग्रह करके वेधा हुआ नक्षत्र का एक पाद विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागना चाहिए; क्योंकि दीपिका ग्रन्थ में कहा है कि जिस स्त्री के विवाह- काल में सप्तशलाका चक्र में पापग्रहों वा शुभग्रहों से चन्द्रमा विद्ध हो वह स्त्री विवाहकाल ही के वस्त्र पहने रोती हुई श्मशानभूमि को जाती है ॥ ५७ ॥ सप्तशलाका चक्र कृ. रो. मृ. आ. पु. पु. श्ले. भ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── म. अ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── पू. रे. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── उ. उ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── ह. पू. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── चि. श. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── स्वा. ध. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── वि. श्र. अ. उ. पू. मू. ज्ये. अ. क्रूरग्रहों से विद्ध नक्षत्रों का दोष और उसका परिहार ऋक्षाणि क्रूरविद्धानि क्रूरमुक्तादिकानि च । भुक्त्वा चन्द्रेण मुक्तानि शुभार्हाणि प्रचक्षते ॥ ५८ ॥ अन्वयः—क्रूरविद्धानि क्रूरभुक्तादिकानि च ऋक्षाणि (तानि यदि) चन्द्रेण भुक्त्वा मुक्तानि (तदा) शुभार्हाणि प्रचक्षते ॥ ५८ ॥ जो नक्षत्र क्रूरग्रहों करके पंचशलाका या सप्तशलाका चक्र में वेधे गये हों और जिनको क्रूरग्रहों ने भोग करके शीघ्र ही छोड़ दिया हो और जिन नक्षत्रों में क्रूरग्रह स्थित हों और जिन नक्षत्रों में क्रूरग्रह जानेवाले हों और जिन नक्षत्रों में भौम, दैव, आन्तरिक्ष, इन तीन प्रकार के उत्पातों में से कोई उत्पात हुआ हो, वे सब नक्षत्र शुभ नहीं होते । इसलिए उन नक्षत्रों में विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए और उन्हीं नक्षत्रों को यदि चन्द्रमा ने भोग करके छोड़ दिया हो तो शुभ हो जाते हैं अर्थात् एक महीने के बाद वे सब नक्षत्र शुभ कार्य करने के लिए शुभ हो जाते हैं ॥ ५८ ॥ *सूर्य, क्षीण चन्द्रमा, मङ्गल, शनैश्चर, राहु और केतु ये क्रूर तथा पापग्रह कहे जाते हैं ।
विवाहप्रकरण १३१ लत्तादोष ज्ञराहुपूर्णेन्दुसिताः स्वपृष्ठे भं सप्तगोजातिशरैर्मितं हि । संलत्तयन्तेऽर्कशनीज्यभौमाः सूर्याष्टतर्काग्निमितं पुरस्तात् ॥ ५९ ॥ अन्वयः—ज्ञराहुपूर्णेन्दुसिताः स्वपृष्ठे सप्तगोजातिशरैर्मितं भं संलत्तयन्ते । (तथा) अर्कशनीज्यभौमाः पुरस्तात् (अग्रे) सूर्याष्टतर्काग्निमितं भं संलत्तयन्ते ॥ ५६ ॥ बुध, राहु, पूर्ण चन्द्रमा, शुक्र ये ग्रह क्रम से अपने पिछले सातवें, नवें, बाइसवें, पाँचवें नक्षत्र को लतियाते हैं अर्थात् बुध जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे पिछले सातवें नक्षत्र को, राहु नवें नक्षत्र को, पूर्ण चन्द्रमा बाइसवें नक्षत्र को और शुक्र पाँचवें नक्षत्र को लात से मारता है । परन्तु राहु सदा वक्री रहता है । इसलिए यदि वह अश्विनी नक्षत्र में स्थित हो तो उसका पिछला नवाँ नक्षत्र श्लेषा होता है । सूर्य, शनैश्चर, बृहस्पति, मङ्गल, ये ग्रह क्रम से अपने अगले बारहवें, आठवें, छठे, तीसरे नक्षत्र को लतियाते हैं, अर्थात् सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित होता है उससे अगले बारहवें नक्षत्र को, शनैश्चर आठवें नक्षत्र को, बृहस्पति छठे नक्षत्र को और मङ्गल तीसरे नक्षत्र को लात से मारता है । प्रयोजन यह है कि इन नक्षत्रों में विवाह नहीं करना चाहिए; क्योंकि सूर्य की लत्ता धन का नाश और चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, राहु इन ग्रहों की लत्ता वर-कन्या का नाश और बृहस्पति की लत्ता बंधु का नाश और शुक्र की लत्ता कार्य का नाश करती है, ऐसा वराहजी ने कहा है ॥ ५९ ॥ पातयोग हर्षणवैधृतिसाध्यव्यतिपातगण्डशूलयोगानाम् । अन्ते यन्नक्षत्रं पातेन निपातितं तत्स्यात् ॥ ६० ॥ अन्वयः—हर्षणवैधृतिसाध्यव्यतिपातगण्डशूलयोगानाम् अन्ते यत् नक्षत्रं तत् पातेन निपातितं स्यात् ॥ ६ ॥ हर्षण, वैधृति, साध्य, व्यतीपात, गंड, शूल इन योगों के समान काल में जो नक्षत्र हो वह पातदोष से दूषित किया जाता है । उदाहरण—यथा किसी दिन कृत्तिका नक्षत्र २२ दण्ड ५ पल है और हर्षण योग १९ दण्ड ९ पल है । अब यहाँ हर्षणयोग कृत्तिका नक्षत्र ही में समाप्त है, इस कारण कृत्तिका नक्षत्र पात से दूषित है । ऐसे नक्षत्र विवाहादि शुभ कार्यों में त्याज्य होते हैं । इसी पात-दोष को नारद और वशिष्ठजी ने अन्य प्रकार से कहा है
१३२ मुहूर्त्तचिन्तामणि कि सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हो उस नक्षत्र से लेकर श्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, श्रवण इन नक्षत्रों तक गिनने से जितनी संख्या हो अश्विनी को लेकर उतनी ही संख्यावाला दिन नक्षत्र पातदोष से दूषित होता है । उदाहरण—यथा ज्येष्ठा में सूर्य है उससे लेकर श्रवण नक्षत्र तक गिनने से पाँच संख्या हुई। अब अश्विनी से पाँचवाँ मृगशिरा नक्षत्र हुआ । यही पात- दूषित हुआ । ऐसे ही और भी जानना चाहिए ॥ ६० ॥ क्रान्तिसाम्य योग पञ्चास्याजौ गोमृगौ तौलिकुम्भौ कन्यामीनौ कर्क्सली चापयुग्मे । तत्रान्योऽन्यं चन्द्रभान्वोनिरुक्तं क्रान्तेः साम्यं नो शुभं मङ्गलेषु ॥ ६१ ॥ अन्वयः—पञ्चास्याजौ, गोमृगौ, तौलिकुम्भौ, कन्यामीनौ, कर्क्सली, चापयुग्मे तत्र अन्योऽन्यं (स्थितयोः) चन्द्रभान्वोः क्रान्तेः साम्यं निरुक्तं (तत्) मंगलेषु नो शुभं स्यात् ॥ ६१ ॥ सिंह और मेष इन दोनों में से किसी एक में चन्द्रमा और दूसरे में सूर्य स्थित हो तो क्रान्तिसाम्य योग होता है । ऐसे ही वृष-मकर, तुला-कुम्भ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन, इन दो-दो राशियों में से किसी एक में सूर्य और दूसरी राशि में चन्द्रमा स्थित हो तो क्रान्तिसाम्य होता है । यह विवाहादि शुभ कार्यों में शुभ नहीं होता ॥ ६१ ॥ एकार्गल दोष व्याघातगण्डव्यतिपातपूर्वशूलान्त्यवज्रे परिघातिगण्डे । योगे विरुद्धे त्वभिजित्समेतः खार्जूरमर्काद्विषमे शशी चेत् ॥ ६२ ॥ अन्वयः—व्याघातगण्डव्यतिपातपूर्वशूलान्त्यवज्रे परिघातिगण्डे (अस्मिन्) विरुद्धे योगे चेत् (यदि) अभिजित्समेतः शशी अर्कात् विषमे (स्थितः) (तदा) खार्जूरं स्यात् ॥ ६२ ॥ जिस दिन व्याघात, गंड, व्यतीपात, विष्कुम्भ, शूल, वैधृति, वज्र, परिघ, अतिगंड इन योगों में से कोई योग हो और जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से लेकर विषम नक्षत्र में चन्द्रमा स्थित हो उस दिन खार्जूर दोष होता है । यहाँ सम-विषम की गणना में अभिजित् का भी ग्रहण है । यह योग विवाहादि शुभ कार्यों में निन्दित होता है । उदाहरण— यथा द्वादशी, रविवार और मूल नक्षत्र व्याघात, योग है, और सूर्य
विवाहप्रकरण १३३ उत्तराषाढ़ में है, इसलिए उत्तराषाढ़ से अभिजित्सहित मूल नक्षत्र तक सत्ताइस हुए। यहाँ सूर्य से चन्द्रमा विषम नक्षत्र में है, इसलिए एकार्गल दोष है। इस दिन विवाह करना अच्छा नहीं है। इस दोष को एकार्गल भी कहते हैं ।। ६२ ।। उपग्रह दोष शराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यस्तिथिर्धृतिश्च प्रकृतेश्च पञ्च । उपग्रहाः सूर्यभतोऽब्जताराः शुभा न देशे कुरुबाल्हिकानाम् ।। ६३ ।। अन्वयः—सूर्यभतः अब्जताराः (यदि) शराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यः तिथिः, धृतिः प्रकृतेः पञ्च (स्युः) (तदा) उपग्रहाः भवन्ति ते कुरुबाल्हिकानां देशे शुभाः न भवन्ति ।। ६३ ।। जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से ५ । ८ । १० । १४ । ७ । १९ । १५ । १८ । २१ । २२ । २३ । २४ । २५ ये चन्द्रमा के तेरह नक्षत्र उपग्रह दोष से दूषित होते हैं। कुरु तथा बाह्लीक देशों में शुभ कार्य करने के लिये ये अशुभ गिने जाते हैं ।। ६३ ।। पातादि दोषों पर विशेष पातोपग्रहलत्तासु नेष्टोऽङ्घ्रिः खेटपत्समः । वारस्त्रिघ्नोऽष्टभिस्तष्टः सैकः स्यादर्द्धयामकः ।। ६४ ।। अन्वयः—पातोपग्रहलत्तासु खेटपत्समः अंघ्रिः नेष्टः स्यात् । (अथ) वारः त्रिघ्नः अष्टभिः तष्टः सैकः अर्द्धयामकः स्यात् ।। ६४ ।। पात, उपग्रह और लत्ता दोष में दोषकारक ग्रह जिस नक्षत्र के जिस चरण में स्थित हो उस नक्षत्र का वही चरण अशुभ होता है अर्थात् पात और उपग्रह में तो जिस नक्षत्र के जिस चरण में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से पाँचवें आदि चन्द्रमा के नक्षत्र का वही चरण दूषित होता है। और लत्ता दोष में लत्ताकारक ग्रह, नक्षत्र के जिस चरण में स्थित होते हैं, चन्द्रमा के नक्षत्र का वही चरण दोषी होता है, सम्पूर्ण नक्षत्र दोषी नहीं होता। अब अर्द्धयाम दोष कहते हैं। दिनमान में आठ का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों, उनको अर्द्धयाम कहते हैं। ऐसे आठ अर्द्धयाम एक दिन में होते हैं। उनमें एक अशुभ होता है। उसके जानने की यह रीति है कि जिस दिन उस अशुभ अर्द्धयाम को जानना हो, रविवार से उस दिन तक
१३४ मुहूर्त्तचिन्तामणि गिनने से जितनी संख्या हो उसे तीन से गुणा करके आठ का भाग देने से जो बाकी बचे उसमें एक और मिलाने से जितनी संख्या हो उतनी संख्या- वाला अर्द्धयाम अशुभ होता है। उदाहरण—यथा रविवार से मंगलवार तक की तीन संख्या को तीन से गुणा किया तो नव हुए । उसमें आठ का भाग दिया तो एक शेष रहा । उसमें एक और मिलाने पर दो हुए । इससे ज्ञात हुआ कि मंगलवार का दूसरा अर्द्धयाम अशुभ होता है । ऐसे ही अन्य दिनों में भी जानना चाहिए, सो चक्र में मैंने स्पष्ट कर दिया है ॥ ६४ ॥ अशुभ अर्द्धयाम चक्र
| रविवार | सोमवार | मंगलवार | बुधवार | बृहस्पति | शुक्रवार | शनैश्चर | दिन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ४ | ७ | २ | ५ | ८ | ३ | ६ | अशुभ अर्द्धयाम |
| कुलिक दोष | |||||||
| शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः कुलिका रखेः । | |||||||
| रात्रौ निरेकास्तिथ्यंशाः शनौ चान्तेऽपि निन्दितः ॥ ६५ ॥ | |||||||
| अन्वयः—रवेः [सकाशात् क्रमेण] शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः तिथ्यंशाः [मुहूर्त्ताः] | |||||||
| कुलिकाः स्युः (ते) निरेकाः रात्रौ कुलिकाः (ज्ञेयाः) च शनौ अन्त्येऽपि (मुहूर्त्तः) | |||||||
| निन्दितः स्यात् ॥ ६५ ॥ | |||||||
| सूर्यादि वारों में १४ । १२ । १० । ८ । ६ । ४ । २ ये मुहूर्त्त कुलिक संज्ञक | |||||||
| होते हैं, अर्थात् दिनमान में पन्द्रह का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों | |||||||
| उनको मुहूर्त्त कहते हैं । ऐसे पन्द्रह मुहूर्त्त एक दिन में होते हैं । उनमें | |||||||
| रविवार को चौदहवाँ, सोमवार को बारहवाँ, मंगल को दशवाँ, बुध को | |||||||
| आठवाँ, बृहस्पति को छठा, शुक्र को चौथा, शनैश्चर को दूसरा मुहूर्त्त कुलिक- | |||||||
| संज्ञक होता है । यही सब मुहूर्त्त एक हीन होकर इन्हीं दिनों की रात्रि में | |||||||
| कुलिक होते हैं अर्थात् रविवार की रात्रि में तेरहवाँ, सोमवार की रात्रि में | |||||||
| गेरहवाँ, मंगलवार की रात्रि में नवाँ, बुध की रात्रि में सातवाँ, बृहस्पति की | |||||||
| रात्रि में पाँचवाँ, शुक्र की रात्रि में तीसरा, शनैश्चर की रात्रि में पहिला तथा | |||||||
| पन्द्रहवाँ भी मुहूर्त्त कुलिकसंज्ञक होता है । ये मुहूर्त्त विवाहादि शुभ कार्यों में | |||||||
| अशुभ होते हैं ॥ ६५ ॥ |
विवाहप्रकरण १३५ कुलिकमुहूर्त्तचक्र
| र० | चं० | मं० | बु० | बृ० | शु० | श० | वार |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १४ | १२ | १० | ८ | ६ | ४ | २ | दिन मुहूर्त्त |
| १३ | ११ | ९ | ७ | ५ | ३ | १।१५ | रात्रि मुहूर्त्त |
दग्धातिथि चापान्त्यगे गोघटगे पतङ्गे कर्काजगे स्त्रीमिथुने स्थिते च । सिंहालिगे नक्रधटे समाः स्युस्तिथ्यो द्वितीयाप्रमुखाश्च दग्धाः ॥ ६६ ॥ अन्वयः—चापान्त्यगे, गोघटगे, कर्काजगे, स्त्रीमिथुने स्थिते च सिंहालिगे नक्रधटे, पतंगे [सूर्ये] सति (क्रमेण) द्वितीयाप्रमुखाः समाः तिथ्यः दग्धाः (भवन्ति) ॥ ६६ ॥ धनु-मीनादि राशियों में सूर्य के स्थित रहते द्वितीयादि सम तिथियां दग्धसंज्ञक होती हैं, अर्थात् धनु और मीन राशि में सूर्य के स्थित रहते द्वितीया, वृष और कुम्भ राशि में सूर्य के रहते चतुर्थी, कर्क और मेष राशि में सूर्य के रहते षष्ठी, कन्या और मिथुन राशि में सूर्य के रहते अष्टमी, सिंह और वृश्चिक राशि में सूर्य के रहते दशमी तथा मकर और तुला राशि में सूर्य के रहते द्वादशी तिथि दग्धा होती है। दग्धा तिथि में विवाहादि शुभ काम न करना चाहिए ॥ ६६ ॥ दग्धातिथिचक्र
| धनु-मीन | वृष कुम्भ | कर्क मेष | कन्या मिथुन | सिंह वृश्चिक | मकर तुला | संक्रांति |
|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | ४ | ६ | ८ | १० | १२ | तिथिदग्धा |
जामित्र दोष लग्नाच्चन्द्रान्मदनभवनगे खेटे न स्यादिह परिणयनम् । किंवा बाणाशुगमितलवगे जामित्रं स्यादशुभकरमिदम् ॥ ६७ ॥ अन्वयः—लग्नात् (वा) चन्द्रात् मदनभवनगे किंवा बाणाशुगमितलवगे खेटे (सति) जामित्रं स्यात्, इह परिणयनं न स्यात्, इदं अशुभकरं स्यात् ॥ ६७ ॥ विवाह की लग्न से अथवा चन्द्रमा से सातवें स्थान में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो जामित्र दोष होता है। जामित्र दोष में विवाह न करना चाहिए । लग्न और चन्द्रमा जिस नवांश में हो उससे पचपनवें नवांश में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो, और कोई ग्रह जिस नवांश में स्थित हो उससे पचपनवें नवांश में यदि लग्न या चन्द्रमा हो तो भी जामित्र दोष होता
१३६ मुहूर्तचिन्तामणि है। यह जामित्र दोष विवाहादि शुभ कार्यों में अति अशुभकारक होता है ॥ ६७ ॥ एकार्गलादि दोषों का परिहार एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्रकर्तर्युदयास्तदोषाः । नश्यन्ति चन्द्रार्कबलोपपन्ने लग्ने यथार्काभ्युदये तु दोषा ॥ ६८ ॥ अन्वयः—चन्द्रार्कबलोपपन्ने लग्ने [सति] एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्रकर्तर्युदयास्त- दोषाः नश्यन्ति, यथा अर्काभ्युदये दोषा (रात्रिः नश्यति) ॥ ६८ ॥ यदि विवाह लग्न सूर्य-चन्द्रमा के स्वोच्चादि-स्थान-स्थितिरूप बल से युक्त हो तो एकार्गल, उपग्रह, पात, लत्ता, जामित्र, कर्तरी, उदयास्तदोष, ये सब नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होते ही रात्रि नष्ट हो जाती है ॥ ६८ ॥ देशभेद से उक्त दोषों का परिहार उपग्रहक्षं कुरुबाह्लिकेषु कलिङ्गबंगेषु च पातितं भम् । सौराष्ट्रशाल्वेषु च लत्तितं भं त्यजेत्तु विद्धं किल सर्वदेशे ॥ ६९ ॥ अन्वयः—कुरुबाह्लिकेषु [देशेषु] उपग्रहक्षं, च कलिङ्गबङ्गेषु पातितं भं, च सौराष्ट्र- शाल्वेषु लत्तितं भं त्यजेत्, विद्धं भं तु सर्वदेशे किल (निश्चयेन) त्यजेत् ॥ ६९ ॥ कुरु और बाह्लीक, इन पश्चिम के देशों में उपग्रह दोषयुक्त नक्षत्र का; कलिङ्ग और बङ्ग, इन पूर्व के देशों में पात दोष का; सौराष्ट्र और शाल्व, इन पश्चिम के देशों में लत्तादोषयुक्त नक्षत्र का और पञ्चशलाकादि चक्र द्वारा ग्रहों से वेधे हुए नक्षत्र का सब देशों में त्याग करना चाहिए ॥ ६९ ॥ दश दोष शशाङ्कसूर्यक्षयुतेर्भशेषं खं भूयुगाङ्गानि दशेशतिथ्यः । नागेन्दवोऽङ्केन्दुमिता नखाश्चेद्भवन्ति चैते दशयोगसंज्ञाः ॥ ७० ॥ अन्वयः—शशाङ्कसूर्यक्षयुतेः भशेषं खं भूयुगांगानि दशेशतिथ्यः नागेन्दवः अंकेन्दुमिताः नखाः चेत् (यदि) भवन्ति च (तदा) एते (क्रमेण) दशयोगसंज्ञाः (भवन्ति) ॥ ७० ॥ अश्विनी से लेकर सूर्य और चन्द्रमा के नक्षत्र तक अलग-अलग गिने । फिर उन दोनों संख्याओं को जोड़कर उसमें सत्ताइस का भाग देने से यदि शून्य, एक, चार, छः, दस, गेरह, पन्द्रह, अठारह, उन्नीस, बीस ये अङ्क बाकी बचें तो दोषी होते हैं, उस नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं होता । उदाहरण—यथा उत्तराषाढ़ में चन्द्रमा और अनुराधा नक्षत्र में सूर्य स्थित है । अश्विनी से
विवाहप्रकरण १३७
चन्द्रमा के नक्षत्र की इक्कीस संख्या और सूर्य के नक्षत्र की सत्रह संख्या हुई । इन दोनों का जोड़ अड़तीस हुआ । इसमें सत्ताइस का भाग दिया तो बाकी गेरह बचे । उक्त रीति से यह अङ्क दोषी है, इसलिए उत्तराषाढ़ नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं है। ये दश अङ्क गिनाये गये हैं; इसलिए इनका दशयोग नाम पड़ गया है ॥ ७० ॥ उक्त दश दोषों का फल वाताभ्राग्निमहीपचोरमरणं रुग्वज्रवादाः क्षति- र्योगाङ्के दलिते समे मनुयुतेऽथौजे तु संकेऽर्द्धिते । भं दस्रादथ संमितास्तु मनुभीरेखाः क्रमात् संलिखे- द्वेधेऽस्मिन् ग्रहचन्द्रयोर्न शुभदः स्यादेकरेखास्थयोः ॥ ७१ ॥ अन्वयः—वाताभ्राग्निमहीपचोरमरणं रुग्वज्रवादाः क्षतिः (इति क्रमेण दशयोग- फलानि ज्ञेयानि) अथ समे योगाङ्के दलिते मनुयुते ओजे [योगांके] सैके अर्द्धिते (सति) दस्रात् भं (ज्ञेयम्) अथ मनुभिः सम्मिताः रेखाः क्रमात् संलिखेत् अस्मिन् एकरेखा- स्थयोः ग्रहचन्द्रयोः वेधः न शुभदः स्यात् ॥ ७१ ॥ इन पूर्व कहे हुए दश अङ्कों में से यदि शून्य शेष हो तो विवाहकाल में वायु बहुत चले, एक शेष हो तो बादल बहुत हों, चार शेष हों तो अग्नि लगे, छः शेष हों तो राजदण्ड हो, दश शेष हों तो चोरी हो, गेरह शेष हों तो मरण हो, पन्द्रह शेष हों तो रोग हो, अठारह शेष हों तो बिजली गिरे, उन्नीस शेष हों तो झगड़ा हो, बीस शेष हों तो हानि हो । इस कारण इन दश योगों को विवाह, देवादिप्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत, पुंसवनकर्म, कर्णछेद, मुण्डनादि शुभ कर्मों में त्यागना चाहिए । अब इन दश योगों का परिहार कहते हैं । पूर्व कहे हुए दश अङ्कों में से यदि सम अङ्कवाला योग आ पड़े तो उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे और यदि विषम अङ्कवाला योग आ पड़े तो उसमें एक और मिलाकर सम करे। तदनन्तर उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे । तब जितनी संख्या हो अश्विनी से लेकर उतनी संख्यावाले नक्षत्र को आड़ी चौदह लकीरों से बने हुए चक्र के आदि में लिखकर क्रम से अभिजित् सहित अट्ठाइस नक्षत्र रेखाओं के छोरों पर लिखे । उन नक्षत्रों में जो ग्रह स्थित हों उन्हें भी वहीं लिखे । यदि इस चक्र में किसी ग्रह और चन्द्रमा का परस्पर वेध हो तो वह अशुभ होता है, अर्थात् इस चक्र की किसी एक ही रेखा के एक छोर पर चन्द्रमा हो और दूसरे छोर
१३८ | मुहूर्त्तचिन्तामणि
पर शुभ या अशुभ कोई अन्य ग्रह स्थित हो तो पूर्वोक्त दश योगों में से यह योग अति अशुभकारक होता है और यदि दूसरे छोर पर कोई ग्रह न स्थित हो तो अशुभकारक नहीं होता। उदाहरण—यथा पूर्वोक्त दश योगांकों में से दस संख्यावाला अङ्क है। इसके दो भाग किये तो पाँच पाँच हुए। एक स्थान में चौदह और मिलाया तो उन्नीस हुए। अब अश्विनी से गिना तो उन्नीसवाँ मूल नक्षत्र हुआ और उन्हीं पूर्वोक्त दश योगों में से गेरह संख्यावाला योग है तो यहाँ एक और मिलाया तो बारह हुए। इनके दो भाग किये तो छः छः हुए। एक स्थान में चौदह और जोड़ा तो बीस हुए। अश्विनी से लेकर गिना तो बीसवाँ पूर्वाषाढ़ नक्षत्र हुआ। इन सम और विषम दोनों अङ्कों से आये हुए मूल और पूर्वाषाढ़ नक्षत्रों में से मूल नक्षत्र को आदि में लिखकर चक्र को स्पष्ट करता हूँ।
मू०...........................................................................................पू० ज्ये०........................................................................................उ०-शु० अ०...........................................................................................अ० वि०...........................................................................................श्र० के०-स्वा०.....................................................................................ध०-सू० बु० श०चं०-चि०....................................................................................श० ह०............................................................................................पू० उ०............................................................................................उ० पू०............................................................................................रे० बु० म०...........................................................................................अ०-मं० रा० आश्ले०.........................................................................................भ० पू०............................................................................................कृ० पु०............................................................................................रो० आ०...........................................................................................मृ०
इस चक्र की छठी रेखा के एक छोर पर चित्रा नक्षत्र है। उसमें चन्द्रमा स्थित है और दूसरे छोर पर शतभिष नक्षत्र है उसमें कोई भी ग्रह नहीं है। इस कारण चन्द्रमा का किसी ग्रह के साथ परस्पर वेध नहीं है। इस चित्रा नक्षत्र में यदि विवाह हो तो पूर्वोक्त दश योग दोष अशुभकारक नहीं हो सकता। इस दश योग का बाधक योग व्यासजी ने कहा है कि यदि विवाह लग्न शुक्र या बृहस्पति से दृष्ट वा युक्त हो तो दश योग नष्ट हो जाता है ॥७१॥
विवाहप्रकरण १३९ दक्षिण देशों में प्रसिद्ध बाणदोष लग्नेनाढ्या याततिथ्योऽङ्कतष्टाः शेषेनागद्व्यब्धिधतर्केन्दुसंख्ये । रोगो वह्नी राजचौरौ च मृत्युर्बाणश्चायं दाक्षिणात्यप्रसिद्धः ॥ ७२ ॥ अन्वयः-याततिथयः लग्नेन आढ्याः अंकतष्टाः नागद्व्यब्धिधतर्केन्दुसंख्ये शेषे (सति क्रमेण) रोगः, वह्निः, राजचौरौ (तथा) मृत्युबाणः स्यात्, च अयं दाक्षिणात्यप्रसिद्धः स्यात् ॥ ७२ ॥ शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर जितनी तिथि बीत गई हों उनमें लग्न की राशि की संख्या को जोड़कर नव का भाग देने पर यदि आठ बाकी रहें तो रोगबाण, दो बाकी रहें तो अग्नि बाण, चार शेष रहें तो राजबाण, छः शेष रहें तो चोरबाण और एक शेष रहे तो मृत्युबाण दोष होता है । यह विवाहादि कार्यों में अशुभ होता है । यह बाणदोष दक्षिण देश के लोगों में प्रसिद्ध है ॥ ७२ ॥