मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरण १३३ उत्तराषाढ़ में है, इसलिए उत्तराषाढ़ से अभिजित्सहित मूल नक्षत्र तक सत्ताइस हुए। यहाँ सूर्य से चन्द्रमा विषम नक्षत्र में है, इसलिए एकार्गल दोष है। इस दिन विवाह करना अच्छा नहीं है। इस दोष को एकार्गल भी कहते हैं ।। ६२ ।। उपग्रह दोष शराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यस्तिथिर्धृतिश्च प्रकृतेश्च पञ्च । उपग्रहाः सूर्यभतोऽब्जताराः शुभा न देशे कुरुबाल्हिकानाम् ।। ६३ ।। अन्वयः—सूर्यभतः अब्जताराः (यदि) शराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यः तिथिः, धृतिः प्रकृतेः पञ्च (स्युः) (तदा) उपग्रहाः भवन्ति ते कुरुबाल्हिकानां देशे शुभाः न भवन्ति ।। ६३ ।। जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से ५ । ८ । १० । १४ । ७ । १९ । १५ । १८ । २१ । २२ । २३ । २४ । २५ ये चन्द्रमा के तेरह नक्षत्र उपग्रह दोष से दूषित होते हैं। कुरु तथा बाह्लीक देशों में शुभ कार्य करने के लिये ये अशुभ गिने जाते हैं ।। ६३ ।। पातादि दोषों पर विशेष पातोपग्रहलत्तासु नेष्टोऽङ्घ्रिः खेटपत्समः । वारस्त्रिघ्नोऽष्टभिस्तष्टः सैकः स्यादर्द्धयामकः ।। ६४ ।। अन्वयः—पातोपग्रहलत्तासु खेटपत्समः अंघ्रिः नेष्टः स्यात् । (अथ) वारः त्रिघ्नः अष्टभिः तष्टः सैकः अर्द्धयामकः स्यात् ।। ६४ ।। पात, उपग्रह और लत्ता दोष में दोषकारक ग्रह जिस नक्षत्र के जिस चरण में स्थित हो उस नक्षत्र का वही चरण अशुभ होता है अर्थात् पात और उपग्रह में तो जिस नक्षत्र के जिस चरण में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से पाँचवें आदि चन्द्रमा के नक्षत्र का वही चरण दूषित होता है। और लत्ता दोष में लत्ताकारक ग्रह, नक्षत्र के जिस चरण में स्थित होते हैं, चन्द्रमा के नक्षत्र का वही चरण दोषी होता है, सम्पूर्ण नक्षत्र दोषी नहीं होता। अब अर्द्धयाम दोष कहते हैं। दिनमान में आठ का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों, उनको अर्द्धयाम कहते हैं। ऐसे आठ अर्द्धयाम एक दिन में होते हैं। उनमें एक अशुभ होता है। उसके जानने की यह रीति है कि जिस दिन उस अशुभ अर्द्धयाम को जानना हो, रविवार से उस दिन तक