भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

१३४ मुहूर्त्तचिन्तामणि गिनने से जितनी संख्या हो उसे तीन से गुणा करके आठ का भाग देने से जो बाकी बचे उसमें एक और मिलाने से जितनी संख्या हो उतनी संख्या- वाला अर्द्धयाम अशुभ होता है। उदाहरण—यथा रविवार से मंगलवार तक की तीन संख्या को तीन से गुणा किया तो नव हुए । उसमें आठ का भाग दिया तो एक शेष रहा । उसमें एक और मिलाने पर दो हुए । इससे ज्ञात हुआ कि मंगलवार का दूसरा अर्द्धयाम अशुभ होता है । ऐसे ही अन्य दिनों में भी जानना चाहिए, सो चक्र में मैंने स्पष्ट कर दिया है ॥ ६४ ॥ अशुभ अर्द्धयाम चक्र

रविवारसोमवारमंगलवारबुधवारबृहस्पतिशुक्रवारशनैश्चरदिन
अशुभ अर्द्धयाम
कुलिक दोष
शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः कुलिका रखेः ।
रात्रौ निरेकास्तिथ्यंशाः शनौ चान्तेऽपि निन्दितः ॥ ६५ ॥
अन्वयः—रवेः [सकाशात् क्रमेण] शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः तिथ्यंशाः [मुहूर्त्ताः]
कुलिकाः स्युः (ते) निरेकाः रात्रौ कुलिकाः (ज्ञेयाः) च शनौ अन्त्येऽपि (मुहूर्त्तः)
निन्दितः स्यात् ॥ ६५ ॥
सूर्यादि वारों में १४ । १२ । १० । ८ । ६ । ४ । २ ये मुहूर्त्त कुलिक संज्ञक
होते हैं, अर्थात् दिनमान में पन्द्रह का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों
उनको मुहूर्त्त कहते हैं । ऐसे पन्द्रह मुहूर्त्त एक दिन में होते हैं । उनमें
रविवार को चौदहवाँ, सोमवार को बारहवाँ, मंगल को दशवाँ, बुध को
आठवाँ, बृहस्पति को छठा, शुक्र को चौथा, शनैश्चर को दूसरा मुहूर्त्त कुलिक-
संज्ञक होता है । यही सब मुहूर्त्त एक हीन होकर इन्हीं दिनों की रात्रि में
कुलिक होते हैं अर्थात् रविवार की रात्रि में तेरहवाँ, सोमवार की रात्रि में
गेरहवाँ, मंगलवार की रात्रि में नवाँ, बुध की रात्रि में सातवाँ, बृहस्पति की
रात्रि में पाँचवाँ, शुक्र की रात्रि में तीसरा, शनैश्चर की रात्रि में पहिला तथा
पन्द्रहवाँ भी मुहूर्त्त कुलिकसंज्ञक होता है । ये मुहूर्त्त विवाहादि शुभ कार्यों में
अशुभ होते हैं ॥ ६५ ॥