मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
१३४ मुहूर्त्तचिन्तामणि गिनने से जितनी संख्या हो उसे तीन से गुणा करके आठ का भाग देने से जो बाकी बचे उसमें एक और मिलाने से जितनी संख्या हो उतनी संख्या- वाला अर्द्धयाम अशुभ होता है। उदाहरण—यथा रविवार से मंगलवार तक की तीन संख्या को तीन से गुणा किया तो नव हुए । उसमें आठ का भाग दिया तो एक शेष रहा । उसमें एक और मिलाने पर दो हुए । इससे ज्ञात हुआ कि मंगलवार का दूसरा अर्द्धयाम अशुभ होता है । ऐसे ही अन्य दिनों में भी जानना चाहिए, सो चक्र में मैंने स्पष्ट कर दिया है ॥ ६४ ॥ अशुभ अर्द्धयाम चक्र
| रविवार | सोमवार | मंगलवार | बुधवार | बृहस्पति | शुक्रवार | शनैश्चर | दिन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ४ | ७ | २ | ५ | ८ | ३ | ६ | अशुभ अर्द्धयाम |
| कुलिक दोष | |||||||
| शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः कुलिका रखेः । | |||||||
| रात्रौ निरेकास्तिथ्यंशाः शनौ चान्तेऽपि निन्दितः ॥ ६५ ॥ | |||||||
| अन्वयः—रवेः [सकाशात् क्रमेण] शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः तिथ्यंशाः [मुहूर्त्ताः] | |||||||
| कुलिकाः स्युः (ते) निरेकाः रात्रौ कुलिकाः (ज्ञेयाः) च शनौ अन्त्येऽपि (मुहूर्त्तः) | |||||||
| निन्दितः स्यात् ॥ ६५ ॥ | |||||||
| सूर्यादि वारों में १४ । १२ । १० । ८ । ६ । ४ । २ ये मुहूर्त्त कुलिक संज्ञक | |||||||
| होते हैं, अर्थात् दिनमान में पन्द्रह का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों | |||||||
| उनको मुहूर्त्त कहते हैं । ऐसे पन्द्रह मुहूर्त्त एक दिन में होते हैं । उनमें | |||||||
| रविवार को चौदहवाँ, सोमवार को बारहवाँ, मंगल को दशवाँ, बुध को | |||||||
| आठवाँ, बृहस्पति को छठा, शुक्र को चौथा, शनैश्चर को दूसरा मुहूर्त्त कुलिक- | |||||||
| संज्ञक होता है । यही सब मुहूर्त्त एक हीन होकर इन्हीं दिनों की रात्रि में | |||||||
| कुलिक होते हैं अर्थात् रविवार की रात्रि में तेरहवाँ, सोमवार की रात्रि में | |||||||
| गेरहवाँ, मंगलवार की रात्रि में नवाँ, बुध की रात्रि में सातवाँ, बृहस्पति की | |||||||
| रात्रि में पाँचवाँ, शुक्र की रात्रि में तीसरा, शनैश्चर की रात्रि में पहिला तथा | |||||||
| पन्द्रहवाँ भी मुहूर्त्त कुलिकसंज्ञक होता है । ये मुहूर्त्त विवाहादि शुभ कार्यों में | |||||||
| अशुभ होते हैं ॥ ६५ ॥ |
विवाहप्रकरण १३५ कुलिकमुहूर्त्तचक्र
| र० | चं० | मं० | बु० | बृ० | शु० | श० | वार |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १४ | १२ | १० | ८ | ६ | ४ | २ | दिन मुहूर्त्त |
| १३ | ११ | ९ | ७ | ५ | ३ | १।१५ | रात्रि मुहूर्त्त |
दग्धातिथि चापान्त्यगे गोघटगे पतङ्गे कर्काजगे स्त्रीमिथुने स्थिते च । सिंहालिगे नक्रधटे समाः स्युस्तिथ्यो द्वितीयाप्रमुखाश्च दग्धाः ॥ ६६ ॥ अन्वयः—चापान्त्यगे, गोघटगे, कर्काजगे, स्त्रीमिथुने स्थिते च सिंहालिगे नक्रधटे, पतंगे [सूर्ये] सति (क्रमेण) द्वितीयाप्रमुखाः समाः तिथ्यः दग्धाः (भवन्ति) ॥ ६६ ॥ धनु-मीनादि राशियों में सूर्य के स्थित रहते द्वितीयादि सम तिथियां दग्धसंज्ञक होती हैं, अर्थात् धनु और मीन राशि में सूर्य के स्थित रहते द्वितीया, वृष और कुम्भ राशि में सूर्य के रहते चतुर्थी, कर्क और मेष राशि में सूर्य के रहते षष्ठी, कन्या और मिथुन राशि में सूर्य के रहते अष्टमी, सिंह और वृश्चिक राशि में सूर्य के रहते दशमी तथा मकर और तुला राशि में सूर्य के रहते द्वादशी तिथि दग्धा होती है। दग्धा तिथि में विवाहादि शुभ काम न करना चाहिए ॥ ६६ ॥ दग्धातिथिचक्र
| धनु-मीन | वृष कुम्भ | कर्क मेष | कन्या मिथुन | सिंह वृश्चिक | मकर तुला | संक्रांति |
|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | ४ | ६ | ८ | १० | १२ | तिथिदग्धा |
जामित्र दोष लग्नाच्चन्द्रान्मदनभवनगे खेटे न स्यादिह परिणयनम् । किंवा बाणाशुगमितलवगे जामित्रं स्यादशुभकरमिदम् ॥ ६७ ॥ अन्वयः—लग्नात् (वा) चन्द्रात् मदनभवनगे किंवा बाणाशुगमितलवगे खेटे (सति) जामित्रं स्यात्, इह परिणयनं न स्यात्, इदं अशुभकरं स्यात् ॥ ६७ ॥ विवाह की लग्न से अथवा चन्द्रमा से सातवें स्थान में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो जामित्र दोष होता है। जामित्र दोष में विवाह न करना चाहिए । लग्न और चन्द्रमा जिस नवांश में हो उससे पचपनवें नवांश में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो, और कोई ग्रह जिस नवांश में स्थित हो उससे पचपनवें नवांश में यदि लग्न या चन्द्रमा हो तो भी जामित्र दोष होता
१३६ मुहूर्तचिन्तामणि है। यह जामित्र दोष विवाहादि शुभ कार्यों में अति अशुभकारक होता है ॥ ६७ ॥ एकार्गलादि दोषों का परिहार एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्रकर्तर्युदयास्तदोषाः । नश्यन्ति चन्द्रार्कबलोपपन्ने लग्ने यथार्काभ्युदये तु दोषा ॥ ६८ ॥ अन्वयः—चन्द्रार्कबलोपपन्ने लग्ने [सति] एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्रकर्तर्युदयास्त- दोषाः नश्यन्ति, यथा अर्काभ्युदये दोषा (रात्रिः नश्यति) ॥ ६८ ॥ यदि विवाह लग्न सूर्य-चन्द्रमा के स्वोच्चादि-स्थान-स्थितिरूप बल से युक्त हो तो एकार्गल, उपग्रह, पात, लत्ता, जामित्र, कर्तरी, उदयास्तदोष, ये सब नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होते ही रात्रि नष्ट हो जाती है ॥ ६८ ॥ देशभेद से उक्त दोषों का परिहार उपग्रहक्षं कुरुबाह्लिकेषु कलिङ्गबंगेषु च पातितं भम् । सौराष्ट्रशाल्वेषु च लत्तितं भं त्यजेत्तु विद्धं किल सर्वदेशे ॥ ६९ ॥ अन्वयः—कुरुबाह्लिकेषु [देशेषु] उपग्रहक्षं, च कलिङ्गबङ्गेषु पातितं भं, च सौराष्ट्र- शाल्वेषु लत्तितं भं त्यजेत्, विद्धं भं तु सर्वदेशे किल (निश्चयेन) त्यजेत् ॥ ६९ ॥ कुरु और बाह्लीक, इन पश्चिम के देशों में उपग्रह दोषयुक्त नक्षत्र का; कलिङ्ग और बङ्ग, इन पूर्व के देशों में पात दोष का; सौराष्ट्र और शाल्व, इन पश्चिम के देशों में लत्तादोषयुक्त नक्षत्र का और पञ्चशलाकादि चक्र द्वारा ग्रहों से वेधे हुए नक्षत्र का सब देशों में त्याग करना चाहिए ॥ ६९ ॥ दश दोष शशाङ्कसूर्यक्षयुतेर्भशेषं खं भूयुगाङ्गानि दशेशतिथ्यः । नागेन्दवोऽङ्केन्दुमिता नखाश्चेद्भवन्ति चैते दशयोगसंज्ञाः ॥ ७० ॥ अन्वयः—शशाङ्कसूर्यक्षयुतेः भशेषं खं भूयुगांगानि दशेशतिथ्यः नागेन्दवः अंकेन्दुमिताः नखाः चेत् (यदि) भवन्ति च (तदा) एते (क्रमेण) दशयोगसंज्ञाः (भवन्ति) ॥ ७० ॥ अश्विनी से लेकर सूर्य और चन्द्रमा के नक्षत्र तक अलग-अलग गिने । फिर उन दोनों संख्याओं को जोड़कर उसमें सत्ताइस का भाग देने से यदि शून्य, एक, चार, छः, दस, गेरह, पन्द्रह, अठारह, उन्नीस, बीस ये अङ्क बाकी बचें तो दोषी होते हैं, उस नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं होता । उदाहरण—यथा उत्तराषाढ़ में चन्द्रमा और अनुराधा नक्षत्र में सूर्य स्थित है । अश्विनी से
विवाहप्रकरण १३७
चन्द्रमा के नक्षत्र की इक्कीस संख्या और सूर्य के नक्षत्र की सत्रह संख्या हुई । इन दोनों का जोड़ अड़तीस हुआ । इसमें सत्ताइस का भाग दिया तो बाकी गेरह बचे । उक्त रीति से यह अङ्क दोषी है, इसलिए उत्तराषाढ़ नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं है। ये दश अङ्क गिनाये गये हैं; इसलिए इनका दशयोग नाम पड़ गया है ॥ ७० ॥ उक्त दश दोषों का फल वाताभ्राग्निमहीपचोरमरणं रुग्वज्रवादाः क्षति- र्योगाङ्के दलिते समे मनुयुतेऽथौजे तु संकेऽर्द्धिते । भं दस्रादथ संमितास्तु मनुभीरेखाः क्रमात् संलिखे- द्वेधेऽस्मिन् ग्रहचन्द्रयोर्न शुभदः स्यादेकरेखास्थयोः ॥ ७१ ॥ अन्वयः—वाताभ्राग्निमहीपचोरमरणं रुग्वज्रवादाः क्षतिः (इति क्रमेण दशयोग- फलानि ज्ञेयानि) अथ समे योगाङ्के दलिते मनुयुते ओजे [योगांके] सैके अर्द्धिते (सति) दस्रात् भं (ज्ञेयम्) अथ मनुभिः सम्मिताः रेखाः क्रमात् संलिखेत् अस्मिन् एकरेखा- स्थयोः ग्रहचन्द्रयोः वेधः न शुभदः स्यात् ॥ ७१ ॥ इन पूर्व कहे हुए दश अङ्कों में से यदि शून्य शेष हो तो विवाहकाल में वायु बहुत चले, एक शेष हो तो बादल बहुत हों, चार शेष हों तो अग्नि लगे, छः शेष हों तो राजदण्ड हो, दश शेष हों तो चोरी हो, गेरह शेष हों तो मरण हो, पन्द्रह शेष हों तो रोग हो, अठारह शेष हों तो बिजली गिरे, उन्नीस शेष हों तो झगड़ा हो, बीस शेष हों तो हानि हो । इस कारण इन दश योगों को विवाह, देवादिप्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत, पुंसवनकर्म, कर्णछेद, मुण्डनादि शुभ कर्मों में त्यागना चाहिए । अब इन दश योगों का परिहार कहते हैं । पूर्व कहे हुए दश अङ्कों में से यदि सम अङ्कवाला योग आ पड़े तो उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे और यदि विषम अङ्कवाला योग आ पड़े तो उसमें एक और मिलाकर सम करे। तदनन्तर उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे । तब जितनी संख्या हो अश्विनी से लेकर उतनी संख्यावाले नक्षत्र को आड़ी चौदह लकीरों से बने हुए चक्र के आदि में लिखकर क्रम से अभिजित् सहित अट्ठाइस नक्षत्र रेखाओं के छोरों पर लिखे । उन नक्षत्रों में जो ग्रह स्थित हों उन्हें भी वहीं लिखे । यदि इस चक्र में किसी ग्रह और चन्द्रमा का परस्पर वेध हो तो वह अशुभ होता है, अर्थात् इस चक्र की किसी एक ही रेखा के एक छोर पर चन्द्रमा हो और दूसरे छोर
१३८ | मुहूर्त्तचिन्तामणि
पर शुभ या अशुभ कोई अन्य ग्रह स्थित हो तो पूर्वोक्त दश योगों में से यह योग अति अशुभकारक होता है और यदि दूसरे छोर पर कोई ग्रह न स्थित हो तो अशुभकारक नहीं होता। उदाहरण—यथा पूर्वोक्त दश योगांकों में से दस संख्यावाला अङ्क है। इसके दो भाग किये तो पाँच पाँच हुए। एक स्थान में चौदह और मिलाया तो उन्नीस हुए। अब अश्विनी से गिना तो उन्नीसवाँ मूल नक्षत्र हुआ और उन्हीं पूर्वोक्त दश योगों में से गेरह संख्यावाला योग है तो यहाँ एक और मिलाया तो बारह हुए। इनके दो भाग किये तो छः छः हुए। एक स्थान में चौदह और जोड़ा तो बीस हुए। अश्विनी से लेकर गिना तो बीसवाँ पूर्वाषाढ़ नक्षत्र हुआ। इन सम और विषम दोनों अङ्कों से आये हुए मूल और पूर्वाषाढ़ नक्षत्रों में से मूल नक्षत्र को आदि में लिखकर चक्र को स्पष्ट करता हूँ।
मू०...........................................................................................पू० ज्ये०........................................................................................उ०-शु० अ०...........................................................................................अ० वि०...........................................................................................श्र० के०-स्वा०.....................................................................................ध०-सू० बु० श०चं०-चि०....................................................................................श० ह०............................................................................................पू० उ०............................................................................................उ० पू०............................................................................................रे० बु० म०...........................................................................................अ०-मं० रा० आश्ले०.........................................................................................भ० पू०............................................................................................कृ० पु०............................................................................................रो० आ०...........................................................................................मृ०
इस चक्र की छठी रेखा के एक छोर पर चित्रा नक्षत्र है। उसमें चन्द्रमा स्थित है और दूसरे छोर पर शतभिष नक्षत्र है उसमें कोई भी ग्रह नहीं है। इस कारण चन्द्रमा का किसी ग्रह के साथ परस्पर वेध नहीं है। इस चित्रा नक्षत्र में यदि विवाह हो तो पूर्वोक्त दश योग दोष अशुभकारक नहीं हो सकता। इस दश योग का बाधक योग व्यासजी ने कहा है कि यदि विवाह लग्न शुक्र या बृहस्पति से दृष्ट वा युक्त हो तो दश योग नष्ट हो जाता है ॥७१॥
विवाहप्रकरण १३९ दक्षिण देशों में प्रसिद्ध बाणदोष लग्नेनाढ्या याततिथ्योऽङ्कतष्टाः शेषेनागद्व्यब्धिधतर्केन्दुसंख्ये । रोगो वह्नी राजचौरौ च मृत्युर्बाणश्चायं दाक्षिणात्यप्रसिद्धः ॥ ७२ ॥ अन्वयः-याततिथयः लग्नेन आढ्याः अंकतष्टाः नागद्व्यब्धिधतर्केन्दुसंख्ये शेषे (सति क्रमेण) रोगः, वह्निः, राजचौरौ (तथा) मृत्युबाणः स्यात्, च अयं दाक्षिणात्यप्रसिद्धः स्यात् ॥ ७२ ॥ शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर जितनी तिथि बीत गई हों उनमें लग्न की राशि की संख्या को जोड़कर नव का भाग देने पर यदि आठ बाकी रहें तो रोगबाण, दो बाकी रहें तो अग्नि बाण, चार शेष रहें तो राजबाण, छः शेष रहें तो चोरबाण और एक शेष रहे तो मृत्युबाण दोष होता है । यह विवाहादि कार्यों में अशुभ होता है । यह बाणदोष दक्षिण देश के लोगों में प्रसिद्ध है ॥ ७२ ॥
१४० मुहूर्त्तचिन्तामणि चौथे में शून्य शेष रहा। इस कारण क्रम से रोग, अग्नि, राज, चोर, ये चार बाण नहीं हुए, और पाँचवें स्थान में पाँच शेष रहे, इस कारण मृत्यु नाम का पाँचवाँ बाणदोष हुआ। इस रीति से कहे हुए बाण में काष्ठ का ही शल्य रहता है, इस कारण अति अशुभकारक नहीं होता। अब लोहे के शल्यवाला बाणदोष कहते हैं। पूर्व कहे हुए पाँचों स्थानों के शेषों के जोड़ में नव का भाग देने पर यदि पाँच शेष रहें तो वह लोहे के शल्यवाला बाणदोष होता है। यह अति अशुभकारक होता है। उदाहरण—यथा ७ । ४ । २ । ० । ५ इन पाँचों शेषों का जोड़ १८ हुआ। इनमें ९ का भाग दिया तो शून्य शेष रहा। इस कारण अति अशुभकारक नहीं हुआ ॥ ७३ ॥ बाणदोष का परिहार रात्रौ चौररुजौ दिवा नरपतिर्वह्निः सदा संध्ययो- र्मृत्युश्चाथ शनौ नृपो विदि मृतिर्भोमेऽग्निचौरौ रवौ । रोगोऽथ व्रतगेहगोन्नृपसेवायानपाणिग्रहे वर्ज्याश्च क्रमतो बुधै रुगनलक्ष्मापालचौराः मृतिः ॥ ७४ ॥ अन्वयः—रात्रौ चौररुजौ (वर्ज्यौ), दिवा नरपतिः (वर्ज्यः), वह्निः सदा (वर्ज्यः), च संध्ययोः मृत्युः (वर्ज्यः), अथ शनौ नृपः, विदि मृतिः, भौमे अग्निश्चौरौ, रवौ रोगः (वर्ज्यः)। अथ व्रतगेहगोपन्नृपसेवायानपाणिग्रहे क्रमशः रुगनलक्ष्मापालचौराः मृतिश्च बुधैः वर्ज्याः ॥ ७४ ॥ चोर और रोगबाण रात्रि में, राजबाण दिन में, अग्निबाण सब काल में और मृत्युबाण प्रातः तथा सायङ्काल की संध्याओं में शुभ नहीं होता। शनैश्चर में राजबाण, बुधवार में मृत्युबाण, मङ्गल में अग्नि और चोर- बाण, रविवार में रोगबाण वर्जनीय है। यज्ञोपवीत, घर का छवाना, राजा की सेवा अर्थात् नौकरी इत्यादि, सवारी करना और विवाह, इन पाँचों कार्यों में क्रम से रोगबाण, अग्निबाण, राजबाण, चोरबाण और मृत्युबाण त्यागना चाहिए, अर्थात् यज्ञोपवीत में रोग
विवाहप्रकरण १४१
अन्वयः—द्याशं, त्रिकोणं, चतुरस्रं, अस्तं (सप्तमं) खेटाः चरणाभिवृद्धया पश्यन्ति, च [तथा] मन्दः, गुरुः, भूमिसुतः, परे [रविचन्द्रबुधशुक्राः] क्रमेण सम्पूर्णदृशः भवन्ति ॥ ७५ ॥ सब ग्रह अपने स्थान से तीसरे-दशवें, पाँचवें-नवें, चौथे-आठवें और सातवें स्थान को पादवृद्धि से देखते हैं, अर्थात् तीसरे-दशवें स्थान को एक पाद अर्थात् चौथाई दृष्टि से, पाँचवें-नवें स्थान को दो पाद अर्थात् आधी दृष्टि से, चौथे-आठवें स्थान को तीन पाद अर्थात् पौन दृष्टि से और सातवें स्थान को चार पाद अर्थात् पूर्णदृष्टि से देखते हैं। अपने स्थान से तीसरे- दशवें स्थान को शनैश्चर, पाँचवें-नवें स्थान को बृहस्पति, चौथे-आठवें स्थान को मंगल पूर्णदृष्टि से देखता है ॥ ७५ ॥ लग्नस्थान की शुद्धि यदा लग्नांशेशो लवमथ तनुं पश्यति युतो भवेद्वाऽयं वोढुः शुभफलमनल्पं रचयति । लवद्यूनस्वामी लवमदनभं लग्नमदनं प्रपश्येद्वा वध्वाः शुभमितरथा ज्ञेयमशुभम् ॥ ७६ ॥ अन्वयः—यदा लग्नांशेशः लग्नं अथ (अथवा) तनुं पश्यति वा युतो भवेत् (तदा) अयं वोढुः अनल्पं शुभफलं रचयति । यदि लवद्यूनस्वामी लवमदनभं लग्नमदनं वा प्रपश्येत् (तदा) वध्वाः शुभं रचयति इतरथा अशुभं ज्ञेयम् ॥ ७६ ॥ यदि विवाहकालिक लग्न से नवांश का स्वामी लग्न के नवांश को या लग्न को देखतां हो, अथवा नवांश या लग्न में स्थित हो तो वह वर को अति शुभ फल देता है। नवांश का उदाहरण—यथा मेष लग्न में मिथुन का नवांश हो, उसका स्वामी बुध तुला में स्थित होकर मिथुन के नवांश को देखता हो, अथवा उसी में स्थित हो । लग्न का उदाहरण—यथा मेष लग्न में मिथुन के नवांश का स्वामी बुध, मकरराशि में स्थित होकर मिथुन- नवांश को नहीं देखता और मेष लग्न को देखता है या उसी में स्थित है । अब सातवें स्थान की शुद्धि कहते हैं। लग्न के नवांश से सातवें नवांश का स्वामी यदि लग्न से सातवें भाव के नवांश को या सातवें भाव को देखता हो या उसी में स्थित हो तो स्त्री को अति शुभ फल करता है । नवांश का उदाहरण—यथा मेष लग्न में मिथुन का नवांश है, उससे सातवें धनु के नवांश का स्वामी बृहस्पति, लग्न से सातवें तुला भाव में स्थित होकर धनु नवांश
१४२ मुहूर्तचिन्तामणि को देखता है या उसी में स्थित है । सातवें भाव का उदाहरण—यथा मेष लग्न में मिथुन का नवांश है । उससे सातवें धनु के नवांश का स्वामी बृहस्पति कर्क में स्थित रहकर अपने नवांश को नहीं देखता और लग्न से सातवें तुला भाव को देखता है या उसी में स्थित है । इस कही हुई रीति से विपरीत अशुभ होता है यदि पूर्वोक्त नवांशों के स्वामी पूर्वोक्त नवांशों को या भावों को न देखते हों और न उनमें स्थित हों तो वर और कन्या की मृत्यु होती है ॥ ७६ ॥ लग्न से सातवें भाव की शुद्धि लवेशो लवं लग्नपो लग्नगेहं प्रपश्येन्मिथो वा शुभं स्याद्वरस्य । लवद्यूनपोंऽशं द्युनं लग्नपोऽस्तं मिथो वेक्षते स्याच्छुभं कन्यकायाः ॥ ७७ ॥ अन्वयः—लवेशः लवं, (तथा) लग्नपः लग्नगेहं वा मिथः (यदि) प्रपश्येत् (तदा) वरस्य शुभं स्यात् । लवद्यूनपः अंशं द्युनं लग्नपः अस्त वा मिथः ईक्षते (तदा) कन्यकायाः शुभं स्यात् ॥ ७७ ॥ नवांश का स्वामी नवांश को और लग्न का स्वामी लग्न को देखता हो अथवा दोनों परस्पर देखते हों, अर्थात् नवांश का स्वामी लग्न को और लग्न का स्वामी नवांश को देखता हो तो वर का शुभ होता है और यदि लग्न के नवांश से सातवें नवांश का स्वामी लग्न से सातवें भाव के नवांश को और लग्न से सातवें भाव का स्वामी लग्न से सातवें भाव को देखता हो अथवा दोनों परस्पर देखते हों, अर्थात् नवांश का स्वामी भाव को और भाव का स्वामी नवांश को देखता हो तो कन्या का शुभ होता है ॥ ७७ ॥ अन्य प्रकार से लग्न और सातवें भाव की शुद्धि लवपतिशुभमित्रं वीक्षतेंऽशं तनुं वा परिणयनकरस्य स्याच्छुभं शास्त्रदृष्टम् । मदनलवपमित्रं सौम्यमंशं द्युनं वा तनुमदनगृहं चेद्वीक्षते शर्म वध्वा ॥ ७८ ॥ अन्वयः—लवपतिशुभमित्रं अंशं तनुं वा यदि वीक्षते तदा परिणयनकरस्य शास्त्रदृष्टं शुभं स्यात् । सौम्यं मदनलवपमित्रं चेत् अंशं द्यूनं वा तनुमदनगृहं वीक्षते चेत् [तदा] वध्वाः शर्म [शुभं] स्यात् ॥ ७८ ॥ लग्न के नवांश के स्वामी का मित्र होकर शुभग्रह, यदि नवांश को या लग्न को देखता हो तो वर को शुभ होता है और लग्न के नवांश से सातवें
विवाहप्रकरण १४३ नवांश के स्वामी का मित्र होकर शुभग्रह यदि लग्न से सातवें भाव के नवांश को या सातवें भाव को देखता हो तो स्त्री को शुभ होता है। ऐसा शास्त्र में कहा और देखा गया है ॥ ७८ ॥ सूर्य-संक्रान्ति में निषिद्धकाल विषुवायनेषु परपूर्वमध्यमान् दिवसांस्त्यजेदितरसंक्रमेषु हि । घटिकास्तु षोडशशुभक्रियाविधौ परतोपि पूर्वमपि सन्त्यजेद्बुधः ॥ ७९ ॥ अन्वयः—विषुवायनेषु [संक्रान्तिषु] (क्रमेण) परपूर्वमध्यमान् दिवसान् त्यजेत् । इतरसंक्रमेषु हि परतः पूर्वं अपि षोडश घटिकाः शुभक्रियाविधौ बुधः त्यजेत् ॥ ७९ ॥ विषुव अर्थात् तुला और मेष, अयन अर्थात् कर्क और मकर की संक्रान्ति जिस दिन हो वह दिन और उससे एक दिन आगे और पीछे, इन तीन दिनों में विवाहादि शुभ कार्य न करे। अन्य संक्रान्तियों में जिस समय संक्रान्ति हो उससे पहिले सोलह दण्ड और पीछे सोलह दण्ड त्याग दे अर्थात् इन बत्तीस दण्डों में विवाहादि शुभ कार्य न करे ॥ ७९ ॥ सूर्यादि ग्रहों की संक्रान्तियों में निषिद्धकाल देवद्वचङ्कर्तवोऽष्टाष्टौ नाड्योऽङ्काः खनृपाः क्रमात् । वर्ज्याः संक्रमणेऽर्कादेः प्रायोऽर्कस्यातिनिन्दिताः ॥ ८० ॥ अन्वयः—अर्कादेः संक्रमणे क्रमात् देवद्वयंकर्तवः अष्टाष्टौ अंकाः खनृपाः नाड्यः वर्ज्याः । अर्कस्य प्रायः अतिनिन्दिताः (भवन्ति) ॥ ८० ॥ संक्रान्ति* काल से पूर्व और पर मिलाकर तेंतिस दण्ड सूर्य की संक्रान्ति में, तो दण्ड चन्द्रमा की संक्रान्ति में, नवदण्ड मंगल की संक्रान्ति में, छः दण्ड बुध की संक्रान्ति में, अठ्ठासी दण्ड बृहस्पति की संक्रान्ति में, नव दण्ड शुक्र की संक्रान्ति में और एक सौ साठ दण्ड शनैश्चर की संक्रान्ति में निषिद्ध होते हैं, इसलिए विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागने के योग्य हैं। किन्तु इनमें सूर्य की संक्रान्तिवाले तेंतिस दण्ड अति अशुभ होते हैं ॥ ८० ॥ पंगु-अन्धादि लग्नदोष घस्रे तुलाली बधिरौ मृगाश्वौ रात्रौ च सिंहाजवृषा दिवान्धाः । कन्यातृयुक्कर्कटका निशान्धा दिने घटोऽन्त्यो निशि पङ्गुसंज्ञः ॥ ८१ ॥ अन्वयः—घस्रे [दिने] तुलाली बधिरौ [भवेताम्], रात्रौ मृगाश्वौ बधिरौ *एक राशि से दूसरी राशि में ग्रहों के जाने को संक्रान्ति कहते हैं ।
दि? It is पंग्वादि`.
Let's check line 20:
पङ्गवंगे निखिलधनानि नाशमापुः सर्वत्राधिपगुरुदृष्टिभिर्न दोषः ।। ८३ ।।
Wait, is there a space between नाशम् and आपुः?
In line 20: नाशमापुः (single word, sandhi: नाशम् + आपुः = नाशमापुः).
In line 22 (अन्वयः): नाशं आपुः । (two words).
In line 20: सर्वत्राधिपगुरुदृष्टिभिर्न दोषः ।। ८३ ।।
In line 22: सर्वत्र अधिपगुरुदृष्टिभिः न दोषः
Let's check line 22:
लग्ने शिशुमरणम्, पग्वंगे निखिलधनानि नाशं आपुः । सर्वत्र अधिपगुरुदृष्टिभिः न दोषः
Wait, in line 22: पग्वंगे vs पङ्गवंगे: it clearly is पग्वंगे.
Line 24:
बहिरी लग्न में यदि विवाह हो तो दारिद्र्य होता है, जो लग्नें दिन में
Wait, look at यदि in line 24:
Is that dot an anusvara or a bindi?
It says यदिं or यदि? It's यदिं. Let's write `
विवाहप्रकरण १८४ शुभ नवांश कार्मुकतौलिककन्यायुग्मलवे झषगे वा। र्यहि भवेदुपयामस्तर्हि सती खलु कन्या ॥ ८४ ॥ अन्वयः—कार्मुकतौलिककन्यायुग्मलवे वा झषगे (लवे) र्यहि उपयामः भवेत् तर्हि (सा) कन्या खलु [निश्चयेन] सती (स्यात्) ॥ ८४ ॥ धनु, तुला, कन्या और मिथुन के नवांश में यदि विवाह हो तो कन्या पतिव्रता होती है। ग्रन्थकार ने मीन का नवांश भी विकल्प से शुभ बताया है, किन्तु प्राचीन मुनियों ने मीन का नवांश त्याज्य कहा है ॥ ८४ ॥ विहित नवांशों में भी किसी का निषेध अन्त्यनवांशे न च परिणेया काचन वर्गोत्तममिह हित्वा । नो चरलग्ने चरलवयोगं तौलिमृगस्थे शशभृति कुर्यात् ॥ ८५ ॥ अन्वयः—इह वर्गोत्तमं हित्वा अन्त्यनवांशे काचन (कन्या) न च परिणेया, तौलमृगस्थे शशभृति चरल
१४६ मुहूर्तचिन्तामणि स्थान में लग्नेश, शुक्र और चन्द्रमा शुभ नहीं होते। आठवें स्थान में चन्द्रमा, लग्नेश, शुभग्रह और मंगल शुभ नहीं होते। और सातवें स्थान में सम्पूर्ण शुभाशुभ ग्रह शुभ नहीं होते ॥ ८६ ॥ विवाहकालिक शुभग्रह त्र्यायाष्टषट्सु रविकेतुतमोऽर्कपुत्रा- स्त्र्यायारिगः क्षितिसुतो द्विगुणायगोऽब्जः । सप्तव्ययाष्टरहितौ ज्ञगुरू सितोष्ट- त्रिद्यूनषड्व्ययगृहान्परिहृत्य शस्तः ॥ ८७ ॥ अन्वयः—त्र्यायाष्टषट्सु रविकेतुतमोऽर्कपुत्राः (शस्ताः स्युः) । क्षितिसुतः त्र्याया- रिगः, अब्जः द्विगुणायगः (शुभः) । ज्ञगुरू सप्तव्ययाष्टरहितौ (शुभौ), अष्टत्रिद्यूनषड्- व्ययगृहान् परिहृत्य सितः शस्तः (स्यात्) ॥ ८७ ॥ लग्न से तीसरे, गेरहवें, आठवें और छठे स्थान में सूर्य शुभ होता है। इन्हीं स्थानों में केतु, राहु और शनैश्चर भी शुभ होते हैं। तीसरे, गेरहवें, छठे स्थान में मंगल शुभ होता है। दूसरे, तीसरे, गेरहवें स्थान में चन्द्रमा शुभ होता है। सातवें, बारहवें, आठवें स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों में बुध और बृहस्पति शुभ होते हैं। आठवें, तीसरे, सातवें, छठे, बारहवें स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों में शुक्र शुभ होता है ॥ ८७ ॥ कर्तरी आदि महादोषों का परिहार पापौ कर्तरिकारकौ रिपुगृहे नीचास्तगौ कर्तरी- दोषो नैव सितेऽरिनीचगृहगे तत्षष्ठदोषोऽपि न । भौमेऽस्ते रिपुनीचगे नहि भवेद्भौमोऽष्टमो दोषकृ- न्नीचे नीचनवांशके शशिनि रिष्फाष्टारिदोषोऽपि न ॥ ८८ ॥ अन्वयः—कर्तरिकारकौ पापौ (यदि) रिपुगृहे (वा) नीचास्तगौ (तदा) कर्तरी- दोषो नैव (भवति), अरिनीचगृहगे सिते तत्षष्ठदोषः अपि न (भवेत्), भौमे अस्ते रिपुनीचगे अष्टमो भौमः दोषकृत् नहि भवेत्, शशिनि नीचे नीचनवांशके (स्थिते) रिष्फाष्टारिदोषः अपि न भवेत् ॥ ८८ ॥ यदि कर्तरी कारक दोनों ग्रह क्रूर हों, अथवा अपने शत्रु के स्थान में स्थित हों या अपने नीच स्थान में हों, अथवा अस्त हों तो कर्तरी दोष नहीं होता। यदि शुक्र अपने शत्रु के स्थान में या नीच स्थान में स्थित हो तो लग्न से छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता। यदि मंगल अपने शत्रु के स्थान
विवाहप्रकरण १४७ में या नीच स्थान में स्थित हो अथवा अस्त हो, तो लग्न से आठवें स्थान में रहकर भी दोषकारक नहीं होता। यदि चन्द्रमा अपने नीच स्थान में या नीच राशि के नवांश में स्थित हो तो लग्न से बारहवें, आठवें, छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता ॥ ८८ ॥ वर्ष आदि अनेक दोषों का परिहार अब्दायनर्तुतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिराऽङ्गमुखाश्च दोषाः । नश्यन्ति विद्गुरुसितेष्विह केन्द्रकोणे तद्वच्च पापविधयुक्तनवांशदोषः ॥ ८९ ॥ अन्वयः—विद्गुरुसितेषु केन्द्रकोणे (स्थितेषु) इह अब्दायनर्तुतिथिमासभपक्षदग्ध- तिथ्यन्धकाणबधिरांगमुखाः दोषाः नश्यन्ति च पुनः तद्वत् पापविधयुक्तनवांशदोषः नश्यति ॥ ८६ ॥ लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बुध, बृहस्पति और शुक्र के रहते सम-विषमादि वर्षदोष, अयनदोष, ऋतुदोष, रिक्तादि तिथिदोष, मास- दोष, क्रूरग्रहसहितादि नक्षत्रदोष, तेरह दिन का पक्षदोष, दग्धातिथिदोष अन्ध-काण-बधिरादि लग्नदोष और अकालवृष्टि आदि दोष नष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही चन्द्रयुक्त राशि के नवांश में पापग्रह के रहने का भी दोष नष्ट हो जाता है ॥ ८९ ॥ अन्य दोषों का परिहार केन्द्रे कोणे जीव आये रवौ वा लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमे वा । सर्वे दोषा नाशमायान्ति चन्द्रे लाभे तद्वद्दुर्मुहूतांशदोषाः ॥ ९० ॥ अन्वयः—जीवे केन्द्रे वा कोणे, वा रवौ आये, वा लग्ने वर्गोत्तमे, अपि वा चन्द्रे वर्गोत्तमे [स्थिते] सर्वे दोषाः नाशं आयान्ति, तद्वत् चन्द्रे लाभे (सति) दुर्मुहूर्तांशदोषाः नाशं आयान्ति ॥ ९० ॥ लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बृहस्पति, लग्न से गेरहवें स्थान में सूर्य तथा लग्न के वर्गोत्तम में या अपने वर्गोत्तम में चन्द्रमा के रहते सब दोष नष्ट हो जाते हैं । ऐसे ही लग्न से गेरहवें स्थान में चन्द्रमा के रहते दुष्टमुहूर्त्तदोष तथा पापग्रह के नवांश का दोष नष्ट हो जाता है ॥ ९० ॥ सामान्य दोषों का परिहार त्रिकोणे केन्द्रे वा मदनरहिते दोषशतकं हरेत्सौम्यः शुक्नो द्विगुणमपि लक्षं सुरगुरुः ।
१४८ मुहूर्तचिन्तामणि भवेदाये केन्द्रेऽङ्गप उत लवेशो यदि तदा समूहं दोषाणां दहन इव तूलं शमयति ॥ ९१ ॥ अन्वयः—सौम्यः त्रिकोणे वा मदनरहिते केन्द्रे (स्थितः) दोषशतकं हरेत् । अपि शुक्रः द्विगुणं, सुरगुरुः लक्षं [लक्षगुणं] दोषं हरेत् । अंगपः उत् लवेशः यदि आये वा केन्द्रे भवेत् तदा दोषाणां समूह दहनः तूलं इव शमयति ॥ ६१ ॥ यदि लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें या दशवें स्थान में बुध स्थित हो तो सौ दोषों को हरता है। यदि इन्हीं स्थानों में शुक्र स्थित हो तो पूर्व से द्विगुण, अर्थात् दो सौ दोषों को हरता है। यदि इन्हीं स्थानों में बृहस्पति स्थित हो तो एक लाख दोषों को हरता है। लग्न का स्वामी अथवा नवांश का स्वामी यदि लग्न, चौथे, दशवें, गेरहवें स्थान में स्थित हो तो दोषों के समूह को वैसे ही नष्ट करता है जैसे अग्नि रुई के ढेर को भस्म करती है ॥ ९१ ॥ लग्न का विंशोपक बल द्वौ द्वौ ज्ञभृग्वोः पञ्चेन्दौ रवौ सार्द्धत्रयो गुरौ । रामा मन्दागुकेत्वारे सार्द्धैकैकं विंशोपकाः ॥ ९२ ॥ अन्वयः—ज्ञभृग्वोः द्वौ द्वौ, इन्दौ पञ्च, रवौ सार्धत्रयः, गुरौ रामः, मन्दागुकेत्वारे सार्धैकैकं विंशोपकाः (भवन्ति) ॥ ६२ ॥ इसी प्रकरण के सत्तासी श्लोक में कहे हुए अपने शुभ स्थानों में स्थित रहते बुध का दो बिस्वा, शुक्र का दो बिस्वा, चन्द्रमा का पाँच बिस्वा, सूर्य का साढ़े तीन बिस्वा, बृहस्पति का तीन बिस्वा, शनैश्चर का डेढ़ बिस्वा और राहु, केतु तथा मंगल का डेढ़-डेढ़ बिस्वा बल होता है। उक्त स्थानों से अन्यत्र स्थित रहते सूर्य आदि ग्रह शून्यबल होते हैं। प्रयोजन यह है कि विवाहकाल में यह सब बल मिलकर पन्द्रह से बीस बिस्वा तक हो तो लग्न शुभ और दश से पन्द्रह बिस्वा तक हो तो मध्यम और पाँच से दस बिस्वा तक हो तो अशुभ होती है। पाँच बिस्वा से कम हो तो वह लग्न वर्जित होती है ॥ ९२ ॥ इवश्ववादि के सुख-दुःख जानने का उपाय श्वश्रूः सितोऽर्कः श्वशुरस्तनुस्तनुर्जामित्रपः स्याद्दयितो मनः शशी । एतद्बलं संप्रतिभाव्य तान्त्रिकस्तेषां सुखं संप्रवदेद्विवाह्रतः ॥ ९३ ॥
विवाहप्रकरण १४९
अन्वयः—सितः श्वश्रूः, अर्कः श्वशुरः, तनुः [लग्नं] तनुः [शरीरं] जामित्रपः दयितः, शशी मनः स्यात् । तान्त्रिकः एतद्बलं संप्रतिभाव्य विवाहतः तेषां सुखं संप्रवदेत् ॥ ६३ ॥ शुक्र सासुसंज्ञक, सूर्य ससुरसंज्ञक, लग्न देहसंज्ञक, लग्न से सातवें स्थान का स्वामी पतिसंज्ञक और चन्द्रमा मनसंज्ञक होता है । विवाहकाल में इन ग्रहों के बल का विचार करके ज्योतिषी को चाहिए कि कन्या के ससुर आदि के सुख दुःख को कहे । विवाहकाल में यदि शुक्र बली हो तो कन्या की सासु को पतोहू की ओर से सुख, यदि सूर्य बली हो तो ससुर को सुख, यदि लग्न बली हो तो कन्या के शरीर को सुख, यदि लग्न से सातवें स्थान का स्वामी बली हो तो कन्या के पति को सुख और चन्द्रमा बली हो तो कन्या के मन को सुख देता है ॥ ९३ ॥ संकरवर्णों के विवाह का मुहूर्त कृष्णे पक्षे सौरिकुजार्केऽपि च वारे वर्ज्ये नक्षत्रे यदि वा स्यात्करपीडा । संकीर्णानां तर्हि सुतायुर्धनलाभ- प्रीतिप्राप्त्यै सा भवतीह स्थितिरेशा ॥ ९४ ॥ अन्वयः—कृष्णे पक्षे अपि च सौरिकुजार्के वारे वर्ज्ये नक्षत्रे वा यदि संकीर्णानां करपीडा स्यात् (तदा) सा (करपीडा) सुतायुर्धनलाभप्रीतिप्राप्त्यै भवति, इह एषा स्थितिः (स्यात्) ॥ ६४ ॥ कृष्णपक्ष में, शनैश्चर, मंगल वा रविवार में, और विवाह में वर्जित नक्षत्रों में यदि संकर वर्णों का विवाह हो तो उनको पुत्र, आयु, धन, लाभ और प्रीति की प्राप्ति होती है ॥ ९४ ॥ गान्धर्वादि विवाह और त्रिपदीचक्र में नक्षत्रशुद्धि गान्धर्वादिविवाहेऽर्काद्वेदनेत्रगुणेन्दवः । कुयुगाङ्गाग्निभूरामास्त्रिपद्यामशुभाः शुभाः ॥ ९५ ॥ अन्वयः—गान्धर्वादिविवाहे त्रिपद्यां अर्कात् (अर्कनक्षत्रात्) वेदनेत्रगुणेन्दवः कुयुगां- गाग्निभूरामाः (क्रमात्) अशुभाः शुभाः (स्मृताः) ॥ ६५ ॥ गान्धर्वादि विवाह में सूर्य के नक्षत्र से चार नक्षत्र अशुभ, फिर दो नक्षत्र शुभ, फिर तीन नक्षत्र अशुभ, फिर एक नक्षत्र शुभ, फिर एक नक्षत्र
१५० मुहूर्तचिन्तामणि अशुभ, फिर चार नक्षत्र शुभ, फिर छः नक्षत्र अशुभ, फिर तीन नक्षत्र शुभ, फिर एक नक्षत्र अशुभ, फिर तीन नक्षत्र शुभ होते हैं। ऐसे ही त्रिपदीचक्र में भी ये नक्षत्र क्रम से अशुभ और शुभ होते हैं ॥ ९५ ॥ सूर्य के नक्षत्र से अशुभ और शुभ नक्षत्र | ४ | २ | ३ | १ | १ | ४ | ६ | ३ | १ | ३ | | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | अ० | शु० | विवाह से पूर्व होनेवाले कार्यों का मुहूर्त विधोर्बलमवेक्ष्य वा दलनकण्डनं वारकं गृहांगणविभूषणान्यथ च वेदिकामण्डपान् । विवाहविहितोडुभिर्विरचयेत्तथोद्वाहतो न पूर्वमिदमाचरेत्त्रिनवषण्मिते वासरे ॥ ९६ ॥ अन्वयः—विधोः बलं अवेक्ष्य विवाहत्रिहितोडुभिः दलनकण्डनं वारकं गृहाङ्गण- विभूषणानि (कार्याणि) अथ वेदिकामण्डपान् च विरचयेत् तथा उद्वाहतः पूर्वं त्रिनवषण्मिते वासरे इदं (पूर्वोक्तं कर्म) न आचरेत् ॥ ९६ ॥ विवाह के लिए जो नक्षत्र शुभ कहे गये हैं उन नक्षत्रों में तथा वर-कन्या के चन्द्रबल को विचारकर विवाह दिन से पूर्व तीसरे, छठे, नवें दिन को छोड़ अन्य दिनों में, आटा पीसना, दाल दलना, चावल कूटना, कलशस्थापन करना, घर और आँगन की सफाई करना, वेदी बनाना, मंडप छवाना आदि कार्य करे ॥ ९६ ॥ वेदी के लक्षण तथा मंडप का उद्वासन हस्तोच्छ्राया वेदहस्तैः समन्तात्तुल्या वेदी सद्मनो वामभागे । युग्मे घस्रे षष्ठहीने च पञ्चसप्ताहे स्यान्मण्डपोद्वासनं सत् ॥ ९७ ॥ अन्वयः—सद्मनः वामभागे हस्तोच्छ्राया समन्तात् वेदहस्तैः तुल्या वेदी (कार्या), च षष्ठहीने युग्मे घस्रे पञ्चसप्ताहे मण्डपोद्वासनं सत् स्यात् ॥ ९७ ॥ घर के बायें भाग में हाथ भर ऊँची, हाथ भर लम्बी और हाथ भर चौड़ी वेदी बनाना चाहिए, और विवाह के दिन से छठे दिन को छोड़ सम दिनों में तथा विषम दिनों में पाँचवें या सातवें दिन मंडप का विसर्जन करना चाहिए ॥ ९७ ॥
विवाहप्रकरण १५१ मंडप के खम्भ गाड़ने का मुहूर्त्त सूर्येऽङ्गनासिंहघटेषु शैवे स्तम्भोऽलिकोदण्डमृगेषु वायौ । मीनाजकुम्भे निर्ऋतौ विवाहे स्थाप्योऽग्निकोणे वृषयुग्मकर्कै ॥ ९८ ॥ अन्वयः—अंगनासिंहघटेषु (स्थिते) सूर्ये शैवे (ईशानकोणे) अलिकोदण्डमृगेषु वायौ, मीनाजकुम्भे निर्ऋतौ वृषयुग्मकर्कै अग्निकोणे विवाहे स्तम्भः स्थाप्यः ॥ ६८ ॥ कन्या, सिंह और तुला में सूर्य के स्थित रहते घर के ईशानकोण में; वृश्चिक, धनु, मकर में स्थित रहते वायव्यकोण में; मीन, कुम्भ, मेष में स्थित रहते नैर्ऋत्यकोण में और वृष, मिथुन, कर्क में स्थित रहते आग्नेय- कोण में खम्भ गाड़ना चाहिए ॥ ९८ ॥
स्तम्भचक्र
| सिंह | कन्या | तुला | ईशान |
|---|---|---|---|
| वृश्चिक | धन | मकर | वायव्य |
| कुम्भ | मीन | मेष | नैर्ऋत्य |
| वृष | मिथुन | कर्क | आग्नेय |
गोधूलिप्रशंसा नास्यामृक्षं न तिथिकरणं नैव लग्नस्य चिन्ता नो वारो न च लवविधिर्नो मुहूर्त्तस्य चर्चा । नो वा योगो न मृतिभवनं नैव जामित्रदोषो गोधूलिः सा मुनिभिरुदिता सर्वकार्येषु शस्ता ॥ ९९ ॥ अन्वयः—अस्यां (गोधूल्यां) ऋक्षं न (चिन्त्यं) तिथिकरणं न, लग्नस्य चिन्ता नैव, वा वारः न, च लग्नविधिः न, मुहूर्त्तस्य चर्चा नो, नो वा योगः, मृतिभवनं नैव, जामित्र- दोषः नैव, (यतः) सा गोधूलिः मुनिभिः सर्वकार्येषु शस्ता उदिता ॥ ६६॥ सम्पूर्ण कार्यों में गोधूलि को मुनियों ने ऐसी शुभ कही है कि इसमें नक्षत्र, तिथि, करण, वार नवांशविधान, योग, आठवें स्थान की शुद्धि, जामित्रदोष ये सब विशेष नहीं विचारे जाते । लग्न का भी विशेष विचार नहीं किया जाता, और मुहूर्त्त का तो कुछ चर्चा ही नहीं है । इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि बहुत से सुयोगों के रहते कोई एक कुयोग भी हो तो गोधूलि में विवाह शुभ होता है । अथवा अन्य समय के लग्न में सब सुयोग ही हों और गोधूलि की लग्न में कुछ दोष भी हो तो गोधूलि ही श्रेष्ठ होती
४. संक्रान्ति, गोचर विचार, विविध कार्य-सिद्धि मुहूर्त एवं ग्रन्थ उपसंहार
है। अथवा पूर्व देशों में तथा कलिंग देश में गोधूलि मुख्य होती है। अथवा गांधर्वविवाह तथा वैश्य आदि के विवाह में गोधूलि श्रेष्ठ है। अथवा कोई शुभ लग्न न हो और कन्या युवती हो गई हो तो विधवा आदि भारी दोषों को छोड़कर गोधूलि में विवाह श्रेष्ठ होतस है ॥ ९९ ॥ समयभेद से गोधूलिकाल पिण्डीभूते दिनकृति हेमन्ततौ स्यादर्धास्ते तपसमये गोधूलिः । संपूर्णस्ते जलधरमालाकाले त्रेधा योज्या सकलशुभे कार्यादौ ॥ १०० ॥ अन्वयः—हेमन्ततौ दिनकृति (सूर्ये) पिण्डीभूते (सति), तपसमये अर्धास्ते (सति) जलधरमालाकाले सम्पूर्णास्ते [सूर्ये सति] गोधूलिः स्यात्, एवं त्रेधा [गोधूलिः] सकल- शुभकार्यादौ योज्या ॥ १०० ॥ हेमन्त ऋतु से यहाँ प्रयोजन शीतकाल से है, जाड़े के चार महीनों में कुहिरा आदि से ढककर सायंकाल में जब सूर्य भात के गोले के समान स्वच्छ तेजरहित देख पड़े तब, और चैत्रादि गर्मी के चार महीनों में सूर्य के आधे अस्त हो जाने पर और वर्षाकाल अर्थात् श्रावण आदि चार महीनों में सूर्य के सम्पूर्ण अस्त हो जाने पर गोधूलि होती है। यह गोधूलि का समय संपूर्ण कार्यों में शुभ होता है। गोधूलिपद का अर्थ यह है कि जब सायं काल में इकट्ठी होकर वन से घर की ओर आती हुई गौओं के खुरों से उठी हुई धूलि से आकाश भर जाता है, उस समय का नाम गोधूलि काल है ॥ १०० ॥ गोधूलि समय में त्याज्य दोष अस्तं यात गुरुदिवसे सौरे सार्के लग्नान्मृत्यो रिपुभवने लग्ने चेन्दौ । कन्यानाशस्तनुमदमृत्युस्थे भौमे वोढुर्लाभे धनसहजे चन्द्रे सौख्यम् ॥ १०१ ॥ अन्वयः—गुरुदिवसे अस्तं याते (सूर्ये), सौरे सार्के गोधूलिः भवति लग्नात् मृत्यौ रिपुभवने, च लग्ने इन्दौ कन्यानाशः स्यात् तथा तनुमदमृत्युस्थे भौमे वोढुः मृत्युः स्यात्, लाभे धनसहजे चन्द्रे (सति) सौख्यं भवेत् ॥ १०१ ॥ बृहस्पति के दिन सूर्यास्त होने के बाद और शनैश्चर के दिन सूर्यास्त होने के पूर्व गोधूलि शुभ होती है। बृहस्पति के दिन सूर्यास्त से पूर्व अर्द्धयाम दोष और शनैश्चर के दिन सूर्यास्त के बाद कुलिक दोष रहता है, इसलिए इन दोनों कालों की गोधूलि निषिद्धि होती है। लग्न से आठवें या छठे स्थान में अथवा लग्न में चन्द्रमा के स्थित रहते कन्या की
विवाहप्रकरण १५३ मृत्यु तथा सातवें या आठवें स्थान में अथवा लग्न में मंगल के स्थित रहते वर की मृत्यु होती है, इसलिए गोधूलिकाल में ऐसा लग्न निषिद्ध होता है। लग्न से ग्यारहवें, दूसरे या तीसरे स्थान में चन्द्रमा के स्थित रहते कन्या और वर दोनों को सौख्य होता है, इसलिए गोधूलिकाल में ऐसा लग्न श्रेष्ठ होता है ॥ १०१ ॥ सूर्य की स्पष्टगति मेषादिगेऽर्केऽष्टशरा ५८ नागाक्षाः ५७ सप्तेषवः ५७ सप्तशरा ५७ गजाक्षाः ५८ । गोऽक्षाः ५९ खतर्काः ६० कुरसाः ६१ कुतर्काः ६१ क्वङ्गानि ६१ षष्टि ६० र्नवपञ्च ५९ भुक्तिः ॥ १०२ ॥ अन्वयः—मेषादिगे अर्के अष्टशराः नागाक्षाः सप्तेषवः, सप्तशराः, गजाक्षाः, गोऽक्षाः, खतर्काः, कुरसाः, कुतर्काः, क्वंगानि, षष्टिः, नवपञ्च, भुक्तिः ॥ १०२ ॥ मेषादि बारह राशियों में इस क्रम से सूर्य की ५८ । ५७ । ५७ । ५७ । ५८ । ५९ । ६० । ६१ । ६१ । ६१ । ६० । ५९ । कला गति होती है ॥ १०२ ॥ सूर्यस्पष्ट करने की रीति संक्रान्तियातघस्राद्यैर्गतिर्निघ्ना खषट् ६० हृता । लब्धेनांशादिना योज्यं यातक्षं स्पष्टभास्करः ॥ १०३ ॥ अन्वयः—संक्रान्तियातघस्राद्यैः गतिः निघ्ना खषट्हृता लब्धेन अंशादिना यातर्क्षं योज्यं, स स्पष्टभास्करः स्यात् ॥ १०३ ॥ जिस दिन जितने दण्ड-पल पर सूर्य की संक्रान्ति लगी हो उस दिन से इष्टकाल पर्यन्त जितने दण्ड-पल हों उनको पूर्व कही हुई कलारूप गति से गुणकर उसमें साठ का भाग दे । जो कुछ अंशादि लब्ध हों उसमें बीती हुई संक्रान्ति की राशि जोड़ दे तो तात्कालिक सूर्य स्पष्ट होता है । उदा- हरण—यथा संवत् १९४९ माघ कृष्ण दशमी बृहस्पतिवार को १२ दण्ड ६ पल पर मकर की संक्रान्ति लगी और माघ कृष्ण त्रयोदशी रविवार को २५ दण्ड ६ पल पर सूर्य स्पष्ट करना है । इसलिए संक्रान्तिकाल से इष्टकाल तक बीते हुए ३ दिन १३ दण्ड ०० पल को पूर्व कही हुई मकर संक्रान्ति की ६० कलारूप गति से गुणकर उसमें ६० का भाग देने से ३