मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० मुहूर्त्तचिन्तामणि चौथे में शून्य शेष रहा। इस कारण क्रम से रोग, अग्नि, राज, चोर, ये चार बाण नहीं हुए, और पाँचवें स्थान में पाँच शेष रहे, इस कारण मृत्यु नाम का पाँचवाँ बाणदोष हुआ। इस रीति से कहे हुए बाण में काष्ठ का ही शल्य रहता है, इस कारण अति अशुभकारक नहीं होता। अब लोहे के शल्यवाला बाणदोष कहते हैं। पूर्व कहे हुए पाँचों स्थानों के शेषों के जोड़ में नव का भाग देने पर यदि पाँच शेष रहें तो वह लोहे के शल्यवाला बाणदोष होता है। यह अति अशुभकारक होता है। उदाहरण—यथा ७ । ४ । २ । ० । ५ इन पाँचों शेषों का जोड़ १८ हुआ। इनमें ९ का भाग दिया तो शून्य शेष रहा। इस कारण अति अशुभकारक नहीं हुआ ॥ ७३ ॥ बाणदोष का परिहार रात्रौ चौररुजौ दिवा नरपतिर्वह्निः सदा संध्ययो- र्मृत्युश्चाथ शनौ नृपो विदि मृतिर्भोमेऽग्निचौरौ रवौ । रोगोऽथ व्रतगेहगोन्नृपसेवायानपाणिग्रहे वर्ज्याश्च क्रमतो बुधै रुगनलक्ष्मापालचौराः मृतिः ॥ ७४ ॥ अन्वयः—रात्रौ चौररुजौ (वर्ज्यौ), दिवा नरपतिः (वर्ज्यः), वह्निः सदा (वर्ज्यः), च संध्ययोः मृत्युः (वर्ज्यः), अथ शनौ नृपः, विदि मृतिः, भौमे अग्निश्चौरौ, रवौ रोगः (वर्ज्यः)। अथ व्रतगेहगोपन्नृपसेवायानपाणिग्रहे क्रमशः रुगनलक्ष्मापालचौराः मृतिश्च बुधैः वर्ज्याः ॥ ७४ ॥ चोर और रोगबाण रात्रि में, राजबाण दिन में, अग्निबाण सब काल में और मृत्युबाण प्रातः तथा सायङ्काल की संध्याओं में शुभ नहीं होता। शनैश्चर में राजबाण, बुधवार में मृत्युबाण, मङ्गल में अग्नि और चोर- बाण, रविवार में रोगबाण वर्जनीय है। यज्ञोपवीत, घर का छवाना, राजा की सेवा अर्थात् नौकरी इत्यादि, सवारी करना और विवाह, इन पाँचों कार्यों में क्रम से रोगबाण, अग्निबाण, राजबाण, चोरबाण और मृत्युबाण त्यागना चाहिए, अर्थात् यज्ञोपवीत में रोग