मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अंश १३ कला ०० विकला लब्ध हुए । इनमें बीती हुई धनु संक्रान्ति की नवीं राशि जोड़ी गई, तब ९ । ३ । १३ । ०० हुए । यही तात्कालिक स्पष्ट सूर्य हुआ ॥ १०३ ॥ लग्नघटिकासाधनार्थ लग्नभुक्तांशसाधन तनोरिष्टांशकात्पूर्वं नवांशा दशसंगुणाः । रामाप्ता लब्धमंशाद्यं तनोर्वर्गादिसाधने ॥ १०४ ॥ अन्वयः-तनोः इष्टांशकात् पूर्वं नवांशाः दशसंगुणाः रामाप्ताः लब्धं वर्गादिसाधने तनोः अंशाद्यं (स्यात्) ॥ १०४ ॥ विवाहादि शुभ कार्य के लिए जिस बली शुभ लग्न का जो दोषरहित विहित नवांश विचारा गया हो उससे पूर्व जितने नवांश उस लग्न के हों उनकी संख्या को दश से गुणाकर तीन का भाग देने से जो कुछ लब्ध हों वही उस लग्न के तात्कालिक भुक्त अंश-कला आदि होंगे और वही उस लग्न के गृह होरा द्रेष्काणादि पूर्वोक्त षड्वर्गसाधन में काम आते हैं । उदाहरण-तथा मिथुन लग्न का सातवाँ नवांश शुद्ध विचारा गया तो उससे पूर्व नवांशों की छः संख्या को दश से गुणा तो साठ हुए । इनमें तीन का भाग देने से २० । ०० लब्ध हुए । यही मिथुन लग्न के भुक्तांशादि होंगे ॥ १०४ ॥ लग्न और सूर्य से इष्टकाल साधन अर्काल्लिग्नात् सायनाद्भोग्यभुक्तै- र्भागैर्निघ्नात् स्वोदयात् खाग्निभक्तात् । भोग्यं भुक्तं चान्तरालोदयाढ्यं षष्ट्या भक्तं स्वेष्टनाड्यो भवेयुः ॥ १०५ ॥ अन्वयः-सायनात् अर्कात् लग्नात् भोग्यभुक्तैः भागैः निघ्नात् स्वोदयात् खाग्नि- भक्तात् भोग्यं भुक्तं (तत्) अन्तरालौदाढ्यं षष्ट्या भक्तं तदा स्वेष्टनाड्यः भवेयुः ॥ १०५ ॥ अयनांशसंयुक्त तात्कालिक सूर्य के भोग्य अंशों से और अयनांशसंयुक्त तात्कालिक लग्न के भुक्त अंशों से गुणे हुए अपने देश के मेषादि लग्नों के मान में तीस का भाग देने से लब्ध हुआ सूर्य का भोग्य अर्थात् भोग करने के लिए बाकी, और लग्न का भुक्त, अर्थात् भोग किया हुआ पलात्मक काल होता है । इन दोनों को तथा सूर्य और लग्न के मध्य लग्नों के पलात्मक प्रमाण को