मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ मुहूर्त्तचिन्तामणि यदि अयनांशयुक्त लग्न और अयनांशयुक्त सूर्य दोनों एक ही राशि में हों तो दोनों के आपस में घटने पर शेष से गुणी हुई अपने देश की उदय में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो, वह सूर्योदय से लेकर इष्टकाल होता है। यदि सायन लग्न तथा सूर्य ये दोनों एक ही राशि में स्थित हों और सूर्य के अंशों से लग्न के अंश कम हों तो उन कम अंशों से गुणी हुई अपने देश की उदय में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो वह सूर्योदय से पूर्व रात्रि का बाकी काल होता है। इसको साठ में घटाने से शेष पूर्व दिन के सूर्योदय से लेकर इष्टकाल होता है। रात्रि में सूर्य की राशि में छः जोड़कर उक्त रीति करने पर इष्टकाल स्पष्ट होता है। एक राशि में स्थित सूर्य से अधिक लग्न का उदाहरण—यथा ९। २५। ६। ३६ इस लग्न में ९। १६। ५९। २६ सूर्य को घटाया तो ०। ८। ७। १० शेष रहे। इन शेष अंकों को लग्न तथा सूर्य के मकरराशि में रहने के कारण मकर की ३०३ उदय से गुण दिया, तो २४६०। ११। ३० हुए। इनमें तीस का भाग दिया तो ८२। २२। १ पलादि लब्ध हुए। सूर्योदय से लेकर यही इष्टकाल हुआ। कम लग्न का उदाहरण—यथा ९। २६। ५०। ४० सूर्य में ९। २२। ४५। ३६ लग्न को घटाया तो ०। ४। ५। ४ शेष रहे। इनको मकर की स्वदेशी ३०३ उदय से गुण दिया तो १२३५। ३५। १२ हुए। इनमें तीस का भाग दिया तो ४१। १५। १० पलादि लब्ध हुए। सूर्योदय से पूर्व इतना रात्रिशेष हुआ। इसको साठ में घटाया तो ५९। १८। ४४। ५० दण्डादि शेष रहे। यही इष्टकाल हुआ। रात्रि में इष्टकाल का उदाहरण तो पूर्व श्लोक में कहे हुए उदाहरण के सायन सूर्य में छः राशि जोड़कर उक्त क्रिया करने से हो जायगा, इसलिये यहाँ नहीं कहा ॥ १०६ ॥ शुभ कार्यों में अवश्य त्यागने योग्य दोष उत्पातान्सह पातदग्धतिथिविद्धृष्टांश्च योगांस्तथा चन्द्रेज्योशनसामथास्तमयनं तिथ्याः क्षयर्द्धी तथा। गण्डान्तं च सविष्टिसंक्रमदिनं तन्वंशपास्तं तथा तन्वंशेशविधूनथाष्टरिपुगान्पापस्य वर्गांस्तथा ॥ १०७ ॥ सेन्दूक्रूरखगोदयांशमुदयास्ताशुद्धिचण्डायुधान् खार्जूरं दशयोगयोगसहितं जामित्रलत्ताव्यधम्।