मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ मुहूर्तचिन्तामणि राजा का मरण होता है। किन्तु यदि शुभग्रह केन्द्र में स्थित हो तो सब शुभ हो जाता है ॥ ३ ॥ सम्पत्ति तथा पृथ्वीस्थिति ये दो योग गुर्लग्नकोणे कुजोऽरौ सितः खे स राजा सदा मोदते राजलक्ष्म्या । तृतीयायगौ सौरिसूर्यौ खबन्ध्वोगु॑रुश्चेद्धरित्री स्थिरा स्यान्नृपस्य ॥ ४ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ राजाभिषेकप्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥ अन्वयः-[यस्य राजाभिषेकसमये] गुरुः लग्नकोणे, कुजः अरौ, सितः खे स राजा सदा राजलक्ष्म्या मोदते चेत् यदि सौरिसूर्यौ तृतीयायगौ, गुरुः खबन्ध्वोः तदा नृपस्य धरित्री स्थिरा स्यात् ॥ ४ ॥ जिस राजा के अभिषेककाल में बृहस्पति लग्न में या नवें, पाँचवें स्थान में, मंगल लग्न से छठे और शुक्र दशवें स्थान में स्थित हो वह राजा सदा राजलक्ष्मीयुक्त होकर आनन्द करता है। शनैश्चर लग्न से तीसरे, सूर्य गेरहवें और बृहस्पति चौथे या दशवें स्थान में स्थित हो तो उस राजा का राज्य सदा स्थिर रहता है ॥ ४ ॥
यात्राप्रकरण ---------:०:--------- यात्रायां प्रविदितजन्मनां नृपाणां दातव्यं दिवसमबुद्धजन्मनां च । प्रश्नाद्यैरुदयनिमित्तमूलभूतैर्विज्ञाते ह्यशुभशुभे बुधः प्रदद्यात् ॥ १ ॥ अन्वयः-प्रविदितजन्मनां नृपाणां यात्रायां दिवसं दातव्यम्। अबुद्धजन्मनां नृपाणां च प्रश्नाद्यैः उदयनिमित्तमूलभूतैः अशुभशुभे विज्ञाते बुधः यात्रायां दिवसं प्रदद्यात् ॥ १ ॥ किसी कार्य की सिद्धि के लिए अन्य देशादि में जाने का नाम यात्रा है। वह कार्यभेद से दो प्रकार की होती है। एक वह जो कि आगे कहे हुए योग, लग्न और जन्मकुण्डली में राजयोग, शुभलग्न के रहते होती है, यथा समरयात्रा । और दूसरी वह जो कि साधारण पंचांगादि की शुद्धि रहते होती है। यथा द्रव्यादि के कमाने या तीर्थादि करने के लिए साधारण यात्रा। इन दोनों के विशेष विचार करने की इच्छा से पहिले उसके अधिकारी को कहते हैं।