मुकुन्दमाला स्तोत्रम् (कुलशेखर आलवार - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Mukundamala Stotram of Kulasekhara Alwar with Commentary
कुलशेखर आलवार (राजा कुलशेखर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुकुन्दमाल 137 34 तत्त्वं प्रसीद भगवन् कुरु म य्यनाथे विष्णो कृपां परमकारुणिकः किल त्वम्, संसार सागर निमग्न मनन्त दीन मुद्धर्तु मर्हसि हरे पुरुषोत्तम मोऽसि. भगवन् = ओ भगवन्तुडा, तत् = आ कारणमुचे, त्वं = नीवु, प्रसीद = नायन्दु कोपरहितचित्तुडवै अनुग्रहिंपुमु, विष्णो = ओ विष्णूवा, अनाथे = दिक्कुलेनि, मयि = नायन्दु, कृपां = दयनु, कुरु = चेयुमु (उंचुमु), त्वं = नीवु, परम कारुणिकः किल = मिक्किलि दयावन्तुडवु गदा, हरे = ओ हरी, (अनन्त = ओ नाशरहितुडा), संसा- रसागरनिमग्नं = संसारमनेडु समुद्रमु नन्दु मुनिगिनवाडुनि, अनन्तदीनं = मिक्किलि दीनुड नगु, मां = नन्नु, उद्धर्तुं = लेवनेत्तुटकु, अर्हसि = तगियुन्नावु, त्वं = नीवु, पुरुषोत्तमः = पुरुषुललो श्रेष्ठुडवु, असि = अगुचुन्नावु. ओ भगवन्तुडा, अनन्तुडा, हरी, विष्णू, नीवु रक्षकान्तर शून्य डनगु नायन्दु कृपचेयवलयुनु. न న్నునుగ్రహింపవలయును (नन्नुनुग्रहिंपवलयुनु). नीवु परमदयाळुडवु कदा! संसारसागरमुनन्दु मुनिगियुन्न दीनुड नगु नन्नु दरिजेर्चुटकु समर्थुडवु काबट्टि पुरुषोत्तमुड वगुचुन्नावु. कुलशेखरुलु : भगवन्तुडा! ईश्वरा! नेनु निन्नु दप्प नितरुनि आश्रयिंपनु. कृपचेयवलयुनु.