मुकुन्दमाला स्तोत्रम् (कुलशेखर आलवार - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Mukundamala Stotram of Kulasekhara Alwar with Commentary
कुलशेखर आलवार (राजा कुलशेखर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें! मुकुन्दमाल 21 अहम् वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनाम् देह माश्रितः, प्राणापान समायुक्तः पचा म्यन्नं चतुर्विधम्। -- गीत. 15.14 अनु श्लोकमुन भगवंतुडु अग्निरूपुडै सर्वप्राणुल शरीर मुल नाश्रयिंचि प्राणापानमुलतो चेरि चतुर्विधान्नमुलनु पचनमु चेयुनट्लु चॆप्पबडॆनु। आ भगवंतुडु मनमु भुजिंचिन पदार्थमु लंदलि सारमुनु ग्रहिंचि असारमुनु वॆलुपलिकि त्रोसिवॆयुनु। ई कारणमुलचेत मनकु स्वातंत्र्यमु लेकुन्नदि। कान -- मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा, निराशी र्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः। -- गीत. 3.30 ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः, लिप्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा। -- गीत. 5.10 अनु श्लोकमुल रीति आ या कार्यमु लाचरिंचुनपुडु भगवदा ज्ञयनि चेयवलॆनु। ई संग तुल नॆఱिगिनवा रैनंदुन कुलशेखरुलु तामे भगवन्नामोच्चारण चेयक भगवंतुनि प्रार्थिंचिरि। वा रट्लु प्रार्थिंचुट यंदुनु ऒक्क विशेष मुन्नदि। 'कुरु' अनगा चेयुमु अनियु, कारय अनगा चेयिंचुमु अनियु नर्थमु। कुलशेखरुलु 'कुरु मे मुकुंद' यनिरि। अनगा मुकुंदा ! नीवु ना वाङ्मुखनं दुंडि नी नाममुनु चेयुमु अनिरि। चेयिंचुमु अनि प्रार्थिंचुटकु माऱुग चेयुमनि वेडिरि। चेयिंचुमु अनि प्रार्थिंचु पक्षमुन, स्वामी! नीवु चेयिंचुमु। नेनु चेसॆदनु अनि चॆप्पिन ट्लगुनु। सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी, नवद्वारे पुरे देही नैवकुर्व[न् न कारयन्।] -- 5.13