नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ६६ ) नायकः - आँखों की सफेद तथा काली कान्ति से आश्रम में (स्थित) उन वृक्षों को मानों शाखाओं के लटकते हुए शोभायमान कृष्णमृग के चर्म समूह से युक्त करती हुई उस (मलयवती) ने मुनि के सामने ही जो मुझे घूम कर देखा था, उसी से ही घायल हुए मुझ पर, हे कामदेव ! आप व्यर्थ ही यह तीर क्यों फेंक रहे हैं ? विदूषक. - अरे मित्र ! तेरी वह धीरता कहाँ गई ? नायक - मित्र ! मैं तो सचमुच धीर ही हूं, क्योंकि - क्या चान्द (की चान्दनी) से उजली रातें मै ने नहीं बिताईं ? क्या (नील) कमल फूलों को नहीं सूंघा ? क्या खिले हुये मालती फूलों से सुगन्धित सायंकाल की हवा को सहन नहीं किया ? क्या मैं ने कमल-समूह में भौरों का गुञ्जार नहीं सुना ? . जिससे आप बिना कारण ही मुझे विरह की घड़ियों में अधीर कहते हो ।
- शाखाएँ 2. फैला हुआ; लगा हुआ; लटकता हुआ।
- ओघः = समूह ।
- फूलों के तीरों वाला । (फूलों के नाम पहिले दे चुके हैं)