भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

( ७१ ) (सोचकर) अथवा, तुम ने झूठ नहीं कहा । मित्र, आत्रेय ! मैं सचमुच अधीर (कायर) हूँ— स्त्रियों के समान (भीरु) हृदय वाले जिस से कामदेव के द्वारा फेंके गए फूलों के बाण भी नहीं सहे गए, ऐसा मैं अब तेरे सामने कैसे कह सकता हूं कि मैं धीर हूं ? विदूषकः — (मन ही मन) इस प्रकार अधीरता स्वीकार करते हुए इस ने हृदय के महान् आवेग को कह डाला है । अतः किसी और तरफ़ इस का ध्यान लगाता हूँ। (प्रकट) मित्र, आज गुरुजनों की सेवा करके आप इतनी जल्दी कैसे यहां आ गए ? नायक — मित्र, यह प्रश्न सचमुच उचित है । (तुम्हें छोड़कर) यह बात और किस से कहूँगा ? आज मैं ने स्वप्न में देखा कि वही प्रियतमा (अंगुली से इशारा कर के) यहां चन्दनलता गृह में ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

  1. अङ्गों अथवा शरीर से रहित, कामदेव ।
  2. मानना, स्वीकार करना ।
  3. घबराहट, हलचल ।
  4. लघु = शीघ्र, जल्दी ।