नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७३ ) चन्द्रकान्तमणि की शिला पर बैठी हुई, प्रेम से क्रुद्ध हुई, मुझे कुछ उलाहना सा देती हुई रो रही है। अतः मैं चाहता हूं कि स्वप्न में अनुभव किए गए प्रिया के मिलाप से रमणीय इस चन्दनलतागृह में बाकी का दिन बिताऊँ। अतः आओ चलें। [घूमते हैं] चेटी— (कान लगा कर, घबराहट से) राजकुमारी, पैरों की आहट सी सुनाई दे रही है। नायिका— (घबराहट से अपनी ओर देखती हुई) सखी, मेरे इस आकार को देखकर कहीं कोई मेरे हृदय पर शक न करे; अतः उठ, इस लाल अशोक वृक्ष के पीछे छिप कर देखें कि यह कौन है। [वैसा ही करती हैं] विदूषक—यह चन्दनलतागृह है। तो आओ भीतर चलें। [दोनों प्रवेश करने का अभिनय करते हैं] नायक— उस चन्द्रमुखी से रहित, चन्द्रमणि शिला से युक्त भी, यह चन्दनलतागृह, चान्दनी से रहित रात्रि के अग्रभाग (सन्ध्या समय) के समान, मुझे प्रिय नहीं।
- शङ्का करनी।
- मुखम् = आरम्भ।