नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ७५ ) चेटी—(देख कर) राजकुमारी ! प्रसन्नता की बात है; बधाई हो । यह तो वही आपके हृदयवल्लभ (प्राणप्रिय) हैं । नायिका- (देख कर हर्ष तथा घबराहट से साथ) सखी, इसे देखकर घबराहट के कारण मैं इस जगह नहीं ठहर सकती । कहीं यह मुझे देख ले ! तो आओ कहीं और चलती हैं। (उत्कण्ठा के साथ पैर रखकर) सखी, मेरी तो जंघाएं काँप रही हैं । चेटी- (हँसकर) अरी भीरू ! यहां ठहरी तुझे कौन देखता है ? क्या आप सचमुच भूल गईं कि यह लाल अशोक का वृक्ष है ? अतः यहीं बैठकर (इसी जगह) ठहरती हैं । [ वैसा ही करती है ] विदूषक– (अच्छी तरह देखकर) हे मित्र, यही वह चन्द्रमणिशिला है । नायिका– (आँसुओं के साथ, गहरी साँस लेता है)