नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ७६ ) तरह न देखी गई हो ! नायिका — यह ठीक है । फिर यह किस प्रणय-कुपित प्रियजन को मन में रख कर इस तरह बातें कर रहे हैं ? चेटी — राजकुमारी ! ऐसी शङ्का मत करो। अच्छा तो फिर (और) सुनती हैं । विदूषक — (मन ही मन) यह इस प्रसङ्ग से प्रसन्न है । अच्छा, इसे ही (आगे) बढ़ाता हूँ । (प्रकट) हे मित्र, तब आप ने उस रोती हुई (अपनी प्रिया) को क्या कहा ? नायक — मित्र, यह कहा कि— (तुम्हारे) आंसुओं के जल से गीला हुआ हुआ यह चन्द्रमणि- शिलातल तुम्हारे मुख रूपी चन्द्रमा के उदय होने से मानों (पिघल कर) चूने लग पड़ा है । नायिका—(क्रोध से) चतुरिका ! क्या इस¹ से भी अधिक कुछ और सुनना बाकी है ?
- किम् + अतः + अपि + अपरम् ।