नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ८१ ) (आँसुओं के साथ) अतः आओ चलें । चेटी — (हाथ से पकड़ कर) राजकुमारी ! ऐसा मत कहो । तुम्हीं स्वप्न में देखी गई हो । इस की दृष्टि (तुम्हें छोड़) किसी और में आसक्त नहीं है । नायिका — मेरे मन को विश्वास तो नहीं होता । (फिर भी) अच्छा इस प्रसङ्ग की समाप्ति तक प्रतीक्षा करती हूँ । नायक — मित्र ! मेरा विचार है कि उसी (प्रिया) की तस्वीर इस शिला पर बनाकर मैं उसके चित्र से ही अपने मन को बहलाऊँ । अतः इसी पर्वतपार्श्व से लाल गैरिकादि धातु के टुकड़े ले आओ । विदूषक — जैसी आपकी आज्ञा । (घूमकर, लेकर, पास आकर) हे मित्र, आप ने तो (केवल) एक ही रंग की आज्ञा दी थी, परन्तु मैं यहां आसानी से प्राप्त होने वाले पांच रंग (के पत्थर) लाया हूं । सो आप चित्र बनाएँ । [देता है ।]
- प्रतीक्षा करती हूँ ।
- आ + लिख् + ल्यप् ।
- यहां 'पुनः' का प्रयोग 'परन्तु' के अर्थ में है ।
- उप + ढौ = पास ले जाना, भेंट करना, देना ।