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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

( ८३ ) नायक—मित्र ठीक किया है (लेकर, शिला पर चित्र खींचते हुए, रोमाञ्चित होकर) मित्र, देखो— मेघादि से अनावृत्त मुख की शोभा को धारण करने वाले तथा नेत्रों को आनन्दित करने वाले चन्द्रमा को पहिली बार देखी गई रेखा के समान, पके हुए बिम्बफल की तरह शोभायमान अधरोष्ठ वाले तथा नयनों को आनन्दित करने वाले प्रियतमा के मुख की रेखा भी (चित्र में) पहिली बार देखी गई (मुझे) सुख देती है। [ चित्र बनाता है ] विदूषक—(उत्सुकता के साथ देखकर) हे मित्र, (प्रिया का) रूप सामने न होने पर भी (उसका) (इतना पूर्ण तथा सुन्दर) चित्र बनाया जा रहा है ? आह, बड़े आश्चर्य की बात है ! नायक—(मुस्कराते हुए) मित्र, मेरे सङ्कल्पों में सामने ठहरी हुई वह प्रिया मानों समीप ही है। यदि उसे देख देख कर मैं (उसका) चित्र बना रहा हूँ तो इसमें कौनसी आश्चर्य की बात है ? नायिका—(आंसुओं के साथ) चतुरिके ! प्रसङ्ग का अन्त जान लिया। तो आओ, मित्रावसु को देखें।

  1. इसके दो अर्थ हैं। चन्द्रमा के साथ—चन्द्रबिम्ब के मेघादि से आच्छादित न होने के कारण शोभा धारण करने वाला। दयितामुख के साथ—पके हुए बिम्बफल के समान शोभायमान अधरोष्ठ वाले।
  2. तथा 3. भी दोनो तरफ लगते हैं।