भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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( ८६ )

नायिका— मैं भी सुनना चाहती हूँ कि पिता जी ने क्या सन्देश भेजा है । मित्रावसु — पिता जी ने यह कहा है कि "मलयवती नाम की मेरी कन्या है जो सम्पूर्ण सिद्धराज वंश की मानों जान है । उसे मैं तुम्हें (विवाह में) देता हूं । (उसे) स्वीकार कीजिए ।” चेटी— (हंसकर) राजकुमारी ! अब क्रोध क्यों नहीं करती ? नायिका—(मुस्कराहट तथा लज्जा के साथ नीचे मुख करके) सखी, मत हँस । क्या तू भूल गई कि इनका मन किसी और (स्त्री) में है ? नायक— (अलग) मित्र, (बड़े) संकट में पड़ गए । विदूषक— (अलग) हे मित्र, मैं जानता हूँ कि उसे छोड़ कर आपका मन और कहीं नहीं लग सकता । अतः जैसे तैसे जो कुछ भी कह कर इसे विदा करो । नायिका—(क्रोध के साथ, मन ही मन) दुष्ट ! यह कौन नहीं जानता ?


  1. जिसकी आस टूट चुकी हो ; जिसने आस तोड़ दी हो ; निर्दय; अभागा; दुष्ट ।