भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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( ६१ ) नायक — मित्रावसु ! आप लोगों के साथ ऐसा प्रशंसनीय सम्बन्ध कौन नहीं चाहेगा ? परन्तु कहीं और लगे हुए मन को अन्यत्र नहीं लगाया जा सकता । अतः मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता । नायिका— (मूर्च्छित हो जाती है) चेटी—धीरज धरो, राजकुमारी, धीरज धरो । विदूषक—अजी, यह पराधीन है। इस से प्रार्थना करने से क्या लाभ ? अतः इसके माता पिता के पास जाकर प्रार्थना कीजिए । मित्रावसु–(मन ही मन) इसने ठीक कहा है । यह अपने माता पिता के कहने का उल्लंघन नहीं करेगा । इस के पिता जी भी इसी गौरी आश्रम में ही रहते हैं अतः जाकर इनके पिता से मलयवती को स्वीकार करने को कहता हूँ । नायिका— (होश में आती है) मित्रावसु—(प्रकट) इस प्रकार अपनी बात कहने पर हमें ‘न’ में उत्तर देने वाले कुमार स्वयं अधिक जानते हैं । नायिका—(क्रोध के साथ, हँसकर) क्या अस्वीकृति से अपमानित मित्रावसु फिर भी बातें कर रहा है ?

  1. इनकार से जो हलका अथवा तिरस्कृत हुआ है ।