नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ६३ ) [ मित्रावसु का प्रस्थान ] नायिका—(आंसुओं के साथ, अपने आप को देखती हुई मन ही मन): दुर्भाग्य रूपी कलङ्क से मलिन, अत्यन्त दुःख के भागी इस शरीर को धारण करने से अब क्या लाभ ? अतः इसी अशोक- वृक्ष के नीचे इस अतिमुक्त लता से गले में फांसी डाल कर मैं अपने आप को मार डालूंगी । तो ऐसा ही सहो । (प्रकट, विचित्र हंसी के साथ) सखी, देखो तो मित्रावसु दूर चले गए कि नहीं, जिससे मै भी यहाँ से चलूँ । चेटी—(कुछ कदम चलकर, देखकर, मन ही मन) इस का मन कुछ और प्रकार का देख रही हूँ । अतः मैं नहीं जाऊँगी । यहीं छिपकर देखूँ यह क्या करती है । (यह कह कर ठहर जाती है) नायिका- (चारों ओर देखकर, फन्दा लेकर, आंसुओं के साथ) हे भगवती गौरी ? यहां (इस जन्म में) तो आप ने कृपा नहीं
- उद्बध्य = फांसी लेकर ।