नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
पृष्ठ 131, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 131
( ६७ ) कर, क्रोध के साथ हाथ छुड़ाना चाहती है)—छोड़ो, मेरा हाथ छोड़ दो ! तुम रोकने वाले कौन हो ? क्या मरने के लिए भी आप से ही प्रार्थना करनी पड़ेगी ? नायक-- मैं नहीं छोड़ता :— जिस हाथ से तुमने हार के योग्य गले में फन्दा डाला है, वह अपराधी हाथ यह पकड़ा गया है। वह कैसे छोड़ा जा सकता है? विदूषक–श्रीमती, इसके इस मरने के निश्चय का क्या कारण है ? चेटी— (अभिप्राय के साथ) यही तुम्हारे प्रिय मित्र । नायक—मैं ही इस के मरने का कारण कैसे हूँ ? यह मैं नहीं समझ सका । विदूषक— आर्ये ! वह कैसे ? चेटी—(अभिप्राय के साथ) जिस प्राणप्यारी को आपके प्रिय मित्र ने शिलातल पर चित्रित किया था उसी में आसक्ति के कारण
- हारलता = लता के समान हलका सा हार ।
- व्यवसाय = कोशिश; निश्चय; काम, क्रिया ।
- आकूतं = अर्थ, अभिप्राय, भाव, आवेग, उत्कण्ठा, इच्छा ।
- पक्षपात = किसी के पक्ष में होना; किसी को पसन्द करना, चाहना, प्रेम करना; लगाव, आसक्ति ।