नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १०३ ) चेटी—(पास जाकर, हर्ष के साथ), राजकुमारी ! बड़े आनन्द की बात है। बधाई हो महाराज जीमूतवाहन के माता पिता ने तुम्हें (पुत्रवधू) स्वीकार कर लिया है। विदूषक— (नाचते हुए) अहा हा !! मेरे प्रिय मित्र के सब मनोरथ पूर्ण हो गए। अथवा, नहीं नहीं, श्रीमती मलयवती के। अथवा, इन दोनों के (ही) नहीं। (खाने का अभिनय करते हुए) मुझ अकेले ब्राह्मण के ही। चेटी— (नायिका से) युवराज मित्रावसु ने मुझे आज्ञा दी है कि— "आज ही मलयवती का विवाह है। अतः शीघ्र ही उसे लेकर आ।" तो आओ चलें। विदूषक— अरे दुष्ट, तू सचमुच इसे लेकर जा रही है। मेरे प्रिय मित्र को क्या यहीं ठहरना होगा ? चेटी— अरे नीच, इतनी जल्दी न कर। आप के स्नान का समय भी आया समझो।
- स्वीकार कर ली गई।
- दास्याः पुत्रो = नौकरानी की बेटी। शब्दार्थ छोड़ अब यह गाली बन गई है। दुष्ट, नीच। 3. निराश, दुष्ट, नीच।
- स्नपनकं = स्नान, नहाना। अथवा, स्नान के समय। अथवा, स्नान की सामग्री (स्नान करने का सामान)।