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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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पृष्ठ 139

(१०२) नायिका — (प्रेम तथा लज्जा के साथ नायक को देखती हुई दासियों के साथ चली जाती है) [पर्दे के पीछे वैतालिक (भाट) पढ़ता है] — अबीर (गुलाल) की वृष्टि से वहां मलय पर्वत पर मेरु पर्वत की सी शोभा धारण करते हुए, झट ही सिन्दूर से दिन के आरम्भ (प्रातः) तथा सायंकाल के प्रकाश की शोभा को मात करते हुए, स्त्रियों के चञ्चल चरणों के बजते हुए नूपुरों की ध्वनि से (मिलकर) मनोहर ऊँचे गीतों द्वारा (यह) सिद्धभूमि आपके कल्याण के लिए विवाह के स्नान के समय की सूचना दे रही है। विदूषक — (सुनकर) हे मित्र ! सौभाग्य से आप के (विवाह) स्नान का समय आ गया । नायक — (हर्ष के साथ) — मित्र ! यदि ऐसा है तो अब यहां ठहरने से क्या लाभ ? तो आओ, पिता जी को नमस्कार करके स्नान भूमि को ही चलें । मेरा विचार है कि रूप, प्रेम, वंश तथा आयु में समान किन्हीं भाग्यशालियों का ही एक दूसरे को देखकर मिलाप हुआ करता है । [सब का प्रस्थान] द्वितीय अङ्क समाप्त ।

  1. सुगन्धित पाउडर (अबीर, गुलाल)। 2. उसी समय; झट ।
  2. उच्च स्वर में गाए गीत । 4. सिद्ध लोग । अथवा, सिद्ध भूमि ।
  3. दूसरा पाठ — “अन्योन्यप्रीतिकृतां” —है, जिस का अर्थ है ‘परस्पर प्रेम करने वाले’। 6. पुण्य अथवा सौभाग्य वाले ।