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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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पृष्ठ 145

( ११३ ) दुष्ट भौंरे (मेरा) क्या कर लेंगे। [वैसा ही करता है] विट— (देखकर, हर्ष पूर्वक) अरे चेट ! (अंगुली से इशारा करके, हँसते हुए) निश्चय ही यह नवमालिका मुझे देखकर, क्योंकि मैं देर से आया हूँ अतः कुपित होकर, (मुखपर) घूंघट करके दूसरी ओर जा रही है। अतः इसे गले लगाकर प्रसन्न करता हूँ। [झट पास जाकर, उमे गले लगाकर, मुख में पान देना चाहता है] विदूषक—(शराब की वू की सूचना देते हुए, नाक पकड़ कर, मुख फेर कर) क्या एक प्रकार के मधुकरों से (भौरों) से छूट कर अब मैं दूसरे दुष्ट मधुकर (शराबी) के मुख (चंगुल) में पड़ गया हूँ। विट—क्या क्रोध से मुंह फेर रही है ? (प्रणाम करता हुआ विदूषक के चरण को अपने सिर पर रख कर) प्रसन्न हो, नवमालिका, प्रसन्न होवो। [चेटी का प्रवेश]


  1. मधुकर = (i) भौंरा; (ii) मस्त शराबी।