भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 309 में से

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पृष्ठ 149

( ११७ )

विदूषक -- बदमाश ! मतवाले ! नवमालिका यहां कहां ? चेटी-(देख कर, मुस्कराती हुई) क्या मुझे समझ कर नशे के कारण परवश हुआ शेखरक आर्य आत्रेय को प्रसन्न कर रहा है ? अच्छा तो नकली गुस्सा करके इन दोनों की हँसी उड़ाती हूँ। चेट- (चेटी को देखकर, शेखरक को हाथ से झंझोड़ कर) स्वामी ! इसे छोड़ दीजिए । यह नवमालिका नहीं है। वह तो क्रोध के कारण लाल लाल आंखों से देखती हुई (यह) आ गई । चेटी - (पास जा कर) शेखरक ! यह कौन मनाई जा रही है ? विदूषक - (घूंघट हटा कर) (यह) मैं हूँ (एक) अभागिन का पुत्र । विट- (विदूषक को देखकर) - अरे भूरे बन्दर ! तू भी शेखरक को धोखा देता है ? अरे चेट ! इसे पकड़ जब तक मैं नवमालिका को प्रसन्न करता हूँ ।


  1. मत्तवालक अथवा मत्तपालक = मतवाला; शराबी ।
  2. अलीकं = झूठा; बनावटी; नकली ।
  3. पुनः + रोष + आरक्त । र् के आगे यदि र् आ जाए तो पहिले र् का लोप हो जाता है । और उस से पहिले के ह्रस्व स्वर को दीर्घ कर देते हैं। अतः पुनर् के र् का लोप हो कर, उससे पूर्व 'अ' दीर्घ हो गया है।
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